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देश का रोना /

  देश का रोना एक बिल्ली के रोने से उभर आईं हैं टेढ़ी -मेढ़ी लकीरें मुहल्ले भर की औरतों के माथे पर होंठ बुदबुदा रहें प्रार्थना के कमजोर शब्द आँखे टिकी है किसी साकार पर वो बचना चाहती हैं अपशकुन से जो पैदा होती है बिल्ली के रोने मात्र से वह नहीं रो सकती भूख से? किसी वेदना से? चिड़ियाँ मडराती है किसी पेड़ के पास चीं चीं के शोर से भर जाता है आसमान कुछ स्त्रियां रोती हैं झुण्ड में दुःख अलग होने पर भी उनकी संवेदना नहीं समाती भाषा में अकेले पार्क में बैठा बूढा आदमी कुर्ते की बांह से पोछता है आंसू देखते हुए दूर छोटा बच्चा वो रोज रख लेता है सिर पर हाथ पढ़ते हुए सुबह का अख़बार टहलता है सुनते हुए कोई पुराना गाना भरते हुए लम्बी सांस पिता बगीचे में ताकते हैं कनेर के सबसे ऊपरी शाख पर खिला फूल माँ रोती है सर्दी के बहाने से कवि अपनी कविता में उगा रहा झरबेरी के पेड़ जिससे उलझते हैं उसके कपड़े चलाते हुए विचारों की कैंची निर्धारित करता है हँसने -रोने का समीकरण विषुवतीय वनों में सुलग रही है आग ध्रुवों पर बर्फ धीरे -धीरे पिघल रही है भूगोलवेत्ताओं के माथे पर उभर रही है नसें ओजोन प...
  सबसे जरूरी बात ============ तुमसे मिलने के बाद कई बार लगा कि- जरूरी नहीं है  तुम्हारा हाथ पकड़ कर ये बीच की सड़क पार करना जो आ गई है मेरे और तुम्हारे बीच या हम खड़े कर दिए गए हैं इसके दो समानांतर किनारों पर बस जरूरी है  गुजरते हुए तुम्हे देखना पीछे मुड़कर एक स्मित के साथ और कानो की बाली का अचानक मुड़ जाना तुम्हारी ओर कैद करने को तस्वीर तुम कहते थे -हसरत से देखी गई चीजें कभी दूर नहीं जाती हैं कई बार काम की बातों में कुछ भी काम का नहीं होता था बस सुनना था तुम्हे अपने भीतर उतारने के लिए बहुत गहरे तुम्हारे पीठ पर अंगुलियों से बना रही थी अपने नाम का पहला अक्षर जो अंकित हो जाये मन की स्क्रीन पर फोन रखते हुए अंगुलियों में उतर आते थे प्राण गूंजते थे कानों में शब्द अनसुने संगीत की तरह मन दुहराता था एक बच्चे की तरह वर्ण माला के सीखे  गए नए अक्षरों को जो बोल देता है शब्द कोश के बाहर के शब्द जिसके अर्थ बने ही नहीं अब तक काम की कई बातों में बहुत कुछ तुम्हारे काम का नहीं था फिर भी तुम ले आये मखमली सी एक शाम अपनी खूबसूरत आँखों की तरह जहाँ नदी थी,-- रे...

इन्तजार /उम्मीदे

  इंतजार करूंगी मैं तुम्हारा पतझड़ में पेड़ की तरह तुम बसंत की तरह एक दिन लौटोगे और मैं लद जाऊंगी नई कोपलों से इंतजार करूंगी मै तुम्हारा सूख गई नदी की तरह जिसकी फटी दरारों पर  पहली बूँद से चमक उठोगे तुम और धीरे-धीरे वापस लौट आएंगी मछलियां तुम्हारे इंतजार में मुझे पेड़ हो जाना है जिस पर लौट आएंगी शाम तक सभी यादें चहचहाती चिड़ियों की तरह और कट जाएगी इंतजार की काली रात मैं समुद्र की तरह अमावस और पूर्णिमा को बेचैन हो जाऊंगी पाने को अपने हिस्से का चांद और फिर समेट लूंगी  सारी लहरों को अपने ही भीतर तुम्हारा इंतजार करते हुए मैं समय का इंतजार करूंगी तुम्हारा आना भी तय है बसंत की तरह बारिश की तरह मेरे सामने अब लंबा इंतजार है जिसे मैं  तय करूंगी तुम्हारे कपड़े पर छूट गई उस महक से जो हवा के साथ मेरे पास आती है और तुम जानते हो हवाओं का कोई तय समय नहीं है मै तुम्हारी खूशबू के गिरफ्त में हूँ और इंतजार के सभी अक्षर प्रेम में मेरे सामने पहाड़ से खडे हो गए हैं। (-------) (2) मै रोज एक उम्मीद उछालती हूँ जैसे कोई बच्चा फेकता है पत्थर खाली आकाश की ओर ...

तुम्हारे जाने से पहले

  तुम्हारे जाने से पहले मेरे भीतर लौटता है डर एक संपेरे  सा उसके बंद संदूक को देखकर कांप उठती है मेरी रूह नहीं जानती हूँ उसके भीतर दुबका है कोई इनकार का अजगर या तुमने लिख भेजा है एक संदेश -जल्दी आऊंगा तुम्हारे पास तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा मे एक क्षण बीतता है कल्प सा बार बार नजरें देख आती है एक अदृश्य रास्ता जिस पर लौटने का कोई निशान नहीं है फिर भी तुम्हारे शब्दों पर एतबार करती हूँ तुम्हे इस बार आने पर बताउंगी तुम्हारे लौट आने मे शामिल है मेरा खुद में लौट आना शहर भर के चरागों का आँखों मे झक से जल जाना गुलमोहर के फूलों सी तुम्हारी यादें छू जाती हैं मेरे मन को एक दिन ज़ब तुम लौट जाओगे उसी घर जाने वाले रास्ते की ओर मेरी दो आँखे छूट जाएगी तुम्हारे पास तुम्हारी याद का अजगर मुझे कसेगा रोज धीरे धीरे ज़ब तक छूट नहीं जाती मेरी आत्मा तुम्हारे ही भीतर फिर नहीं गढ़नी होगी तुम्हे मेरे लिए प्रेम की कोई भाषा नहीं खींचनी होगी कोई रेखा मेरे और तुम्हारे बीच समय भी मेरी तरह एक दिन थक कर लग जायेगा तुम्हारे गले और बचा लेगा प्यार की आखिरी उम्मीद को। गरिमा सिंह...

जाना मात्र क्रिया नहीं

  जाना' मात्र क्रिया नहीं मै तुम्हे रोक सकती थी दूर जाते हुए पकड़ सकती थी तुम्हारा हाथ क्यूंकि तुम नहीं गए थे चुपके से तथागत की तरह तुम्हारे चले जाने का बोध था मुझे मुझे इंतजार था कि तुम मुड़कर देखोगे एक बार पीछे तुम जान पाओगे कुछ जगहे छोड़े जाने के लिए नहीं होती हैं कभी छूटती भी नहीं है दूर जाने पर चली आती है तुम्हारे पास तुम मुड़ना नहीं जानते थे ऐसे समय मे जब सब कुछ क्रियाशील है 'रुक जाना 'एक निरर्थक क्रिया हो सकती है एक प्रगतिशील आदमी के लिए मै तुम्हे रोक भी लेती यदि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जाना मात्र क्रिया नहीं है मेरे जीवन की सबसे दुःखद घटना हो सकती है अब जबकि तुम इतना दूर हो तुम्हारा होना नहीं पैदा करता मेरे भीतर कोई शोर निर्वात मे नहीं आती है कोई आवाज़ ऐसे समय मे तुम्हारा लौट आना इस सदी के इतिहास की सबसे क्रन्तिकारी घटना बन सकती है।              गरिमा सिंह

कवि

  कवि के मन मे रहता है एक कोना घर के सबसे पीछे अँधेरे और उपेक्षित तहखाने की तरह जहाँ वह झाँक लेता है खिड़कियों से कभी मोमबत्ती की रोशनी जलाकर अक्सर फेंक देता है अनुपयोगी सामान बीनकर कविता से और जीवन से जिसका रोशनी मे आना बना सकता है उसे कमजोर वो कई सालों से नहीं juta पाया है हिम्मत घुसने को इस सीलन भरे तहखाने मे कुछ उपयोगी वस्तुए छूट गई है बहुत पहले या फेंक दिया था, आज खोजना है उसे जैसे खो जाती है कभी कोई सूई किसी रुई के ढ़ेर मे जिसके दरवाजों की चरमराहट से उड़ जाती है मुंडेर पर बैठी चिड़िया दुबक जाते है भीतर कई चेहरे अंधेरे मे जहाँ प्रवेश करना कवि का किसी वर्जित दुनिया मे जाना है और खींच लाना है तमाम अनसुलझे रहस्य जो दर्ज है मेज पर रखी फटी डायरी मे बीच बीच मे मुडे पन्नो के साथ मन के इस कोने मे कभी करता है पुताई दीवारो की बचाने को अपनी खोई पुरानी यादों को जिसे नीम अंधेरे उठकर टटोलता है और निकलता है कुछ मरहम कोई पट्टी और दवा उसमे पड़ी है एक पुरानी डायरी के फटी पन्ने जिसमें छूट गई है अधूरी कविताएं और पुरानी पर्श मे रखा है एक पासपोर्ट फोटो जो अक्सर जीवंत हो जाती ह...

सब ठीक है

  तुमसे मिली थी पहले भी कई बार और तुमने औपचारिकता वश कई बार पूछा था यूँ ही -सब ठीक? मैंने सिर हिलाया था कई बार हाँ में सब ठीक करने की सहमति में और मन नकार जाता था -सब कुछ ठीक कहाँ? कितनी बार दिन में चलती रही बिना ठहरे जिसे भटकना कह सकते है और रात मुँह फुलाए बैठी रही मेरी ओर पीठ किये जिसे शायद रूठना कह सकते है कितनी बार दरखतों से झाँक लेते है फटे हुए बादल और सारे सौन्दर्यबोध को झोंक देती हूँ सब कुछ ठीक होने के बहाने के बीच में न जाने कितनी बार एक चेहरा मेरे दुःख का हिस्सेदार रहा और वो मुझे ठीक से जानता भी नहीं था उससे मुझे कई बार शिकायते रहीं ये जानते हुए भी कि हर चेहरे पर नहीं लिखा जा सकता है भरोसा और हर आदमी नहीं जान सकता है सब ठीक है " बोले जाने का उतार चढाव वो नहीं माप सकता शब्द की गहराई को आज फिर मै तुमसे मिली कई बार की तरह तुमने पूछा -सब ठीक? कई बार की तरह मैंने भी सिर हिलाया सब कुछ ठीक है। और बहुत जोर से हँसी ठहाके के साथ भीतर कुछ खटाक से टूटा मेरे कानो ने भी नहीं सुनी कोई आवाज़ तुम्हारी तरह लेकिन दिन और रात को जरूर महसूस हुआ और नदी को भी अगल...

छल

  दृश्य में भीड़ है भीड़ में एक चेहरा है उस पर टिकी है हजारों नजरें उम्मीद से भरी हुई विस्मय से खींची हुई बढ़ रही है नजरें उसके चारों ओर भीड़ में अकेले चेहरे को कोई फर्क नहीं पड़ता इस सवालों भरी नजरों से वो जानता है सारे सवाल उन सवालों का आधा इतिहास उसी ने पैदा किये है सवाल और भीड़ उलझ गई है खोजने में उसके उत्तर कई बार ऐसे ही भीड़ ने कई बार उठाये सवाल,पहले भी वो भीड़ किसी खाई में समा गई अपने अनसुलझे सवालों की फेहरिस्त के साथ  

देखना स्त्री को

  देखना स्त्री को उतर कर कभीअपने ऊँचे मकान से निकल कर बाहर चौखट के बिना खटकाये साँकल जब खुले हो मन के दरवाजे और आँखों मे बहती हो कोई अदृश्य नदी या झरना देखना उसे थोड़ा सा आँखों को मीचकर बहुत पास से क्यूंकि स्पष्ट दिखने के लिए जरूरी है बराबरी पर बनना प्रतिबिम्ब उसे छूना जब उतर जाये तुम्हारे भीतर प्राण और अंगुलियों के पोरो पर नहीं चटकती हो चिंगारी जब चुक जाये तुम्हारे अनर्गल शब्द तुम एक स्त्री को पाना साँसो की तरह जो मौजूद है साथ तब भी जब तुम सोते हो गहरी नींद मे तब भी जब स्थिर हो जब भाग रहे हो बहुत तेजी से बचाने को अपना स्व तब भी जब तुम्हे नहीं महसूस होती अपने भीतर कोई उत्तेजना वो रहती है हमेशा बिना कोई जगह घेरे भीतर शांत,अडोल, मध्यम सुषमना नाड़ी की तरह उसे चाहो जैसे बुद्ध ने चाहा था ज्ञान को और किया था महाभिनशक्रमण राज पाट और अधिकार से ही नहीं अपने होने के झूठे दम्भ से अपने  निर्मित पुरुषतत्त्व से और चखा था एक बहिस्कृत स्त्री के भोजन का स्वाद गुजरे थे खुद के अंदर होने को एकात्म और जाना था स्त्री नहीं एक पुरुष के भीतर स्त्री का आभाव हमें बनाता है...

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...

मै नदी हूँ

मै नदी हूँ गुजर जाउंगी तुम्हारे भीतर चुपचाप नक्शे पर छोड़े बिना कोई निशान बिखरूंगी नहीं तुम्हारी आँखों में क्षणिक सौंदर्य बनकर किसी झरने की तरह नहीं घिसना मुझे कोई पत्थर न कोई शिवलिंग ही बनाऊंगी जिसके सहारे तुम फिसलते रहे मेरी आत्मा के किसी छोर पर और मै ढोती रही अपने सिर पर तुम्हारे किये का भार मै  किसी गंगा की तरह नहीं धोऊंगी तुम्हारे पाप तुम्हारे पुरखो को तारने मै नहीं उतरूंगी धरती पर किसी भागीरथ की तपस्या के जाल मे फंसकर नहीं बधूँगी शिव की जटाओ में कभी मै बदलते हुए रास्ते गुजर नहीं जाउंगी डुबाकर तुम्हारे सीमान्त मै किसी समुद्र मे जाकर भी नहीं मिलूंगी न कोई गार्ज ही बनाऊंगी मै तुम्हारे भीतर एक सुराख़ कर बहती रहूंगी अदृश्य जिन्दा रहूंगी तुम्हारे इतिहास में तुम्हारे भूगोलवेत्ता खोजते थक जाएंगे मेरा उदगम मेरा अवसान मै बहती रहूंगी अदृश्य तुम्हारे हृदय में सरस्वती नदी की तरह ¡ --गरिमा सिंह 

पिता होना

  कुछ भी नहीं रह सकता है अधूरा सब लालायित है पूर्णता के लिए भागती है नदी समुद्र की ओर झरना किसी नदी की तलाश मे बूंदे भी किसी गड्ढे की खोज मे गिरती है जो भी पूरा नहीं होता है जीवन मे वो मन पर लिख जाता है एक दुःस्वप्न की तरह जिसकी याद से अक्सर नींद खुल जाती है मेरा मन भी खोजता है बच्चा होना जिसका कोई पिता हो पूर्ण जिसकी अंगुलियों को पकड़ा जा सके कभी फिसलते हुए कभी तेज चलते हुए कभी पकड़ते हुए बस या कोई गाड़ी मन अनेक बार एक छाँव खोजता है वह किसी पेड़ के पास ठहर जाना चाहता है कुछ देर भले ही वह कुछ न सुनता हो कुछ न समझाता हो पिता का सानिध्य तलाशने मे मुझे मिले कई प्रेमी कई बार जीवन मे मैं नहीं बता पाई उनसे कभी मन के स्पष्ट भाव वो नहीं चुनते कभी पिता होने को उनका प्रेमी होना ही उन्हें चुनना था मेरा प्रेमी पिता की शक्ल मे ढल जाता है जीवन मे कई बार उदास शामों मे प्रेमी के गले लगकर रोते हुए वह बदल गया पिता मे उसकी अंगुलियों मे मैंने महसूस किया वात्सल्य कई बार उसके पास होकर माथे को चूमते हुए लरजते है  होंठ मेरे कुछ दिनों बाद गिर जातीहै कोई महीन चादर जो द...

कृति बहुमत मे कविता

 

शहर दर शहर

  कितने शहर जागते है मेरे भीतर एक साथ मन के विस्तर पर चुपचाप बदलते है करवट यादों का एक पुलिंदा रखे सिरहाने मुझे भी दिखाते है कई दृश्य कई शहरो मे भटकते हुए टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर बैठ जाती हूँ उनकी गलियाँ तंग है बहुत सिसकियाँ लेते हुए जार जार एक बच्चे की तरह कितने शहर लिपट गए है मेरी आत्मा से और ताकतें है मेरी आँखों मे जैसे देख लिया हो कोई मनपसंद खिलौना पोंछते हुए आंसू मासूम सी हँसी बिखर जाती है वो शहर  जहाँ मैने देखा था पहली बार जीवन को पलते हुए बहुत नजदीक से ढलते हुए  एक शाम और जाना था सब कुछ ढलता है शहर कोई भी हो सबके पास अपनी शाम होती है अपने तरह की एक सुबह भी सब कुछ था खुशनुमा एक चाँद की तरह वह शहर मुझे पहचानता था मुझसे ज्यादा सारे फूल मेरे दोस्त थे कोयल के साथ कूकते हुए घंटो हॅसते थे अनायास वो शहर जहाँ घर से ज्यादा किताबें पसंद थी बस्ते मे पूरा शहर समा जाता था किसी उपन्यास से निकलकर नायक धीरे से पकड़ता था हाथ ले जाता था कल्पना लोक मे चेहरे की लालिमा अचानक बढ़ जाती थी तितलियाँ आ जाती थी थोड़ा पास कई शहर बदले मेरे भीतर कई चेहरे इन शहरों मे खो...

सब लिख रहे है

  जब सब लिख रहे थे हथियार लिख रहे थे युद्ध बोना चाहते थे दंगाई सीने मे बन्दूके पत्थर बाजी  सीख रहे थे हाथों मे पकड़े हुए कलम मैंने लिखा फूल लिखा युद्ध का अधूरा अंत बचाना सीखा अपना सिर हाथों मे पकड़े हुए कलम मैं भी लिखना चाहती थी एक फूल एक तितली एक बगीचा जब सब लिख रहे थे पीला पत्ता जब सब महसूस कर रहे थे आग जो फैली है चारों तरफ सोख रही है पानी उठ रहा है धुआँ मैंने अंगुली से पानी पर बना दिया जंगल जंगल से गायब है जानवर गायब है पहाड़ नदी जंगल से गायब है पेड़ भी जब सब दौड़े जा रहे थे भूख कहते हुए उस आखिरी छोर की ओर जहाँ फ़सल खेतों मे जल रही है जहाँ छूटे सांडो ने रौंद दिया है पूरा खेत बची खुची कुछ फसले लाद दी गई है शहर की ओर जाने वाली गाड़ी पर मै ख़डी थी कागज को हाथ मे लिए जहाज बनाकर हवा मे उडाने के लिए जब कुछ लोग शांत है एकदम चुप, बुत की तरह मै तोडना चाहती हूँ चुप्पी दागे गए गोले की तरह उड़ा देना चाहती हूँ  कविता अपनी जिसमें मैंने हथियार की जगह गलती से समझौता लिखा था। गरिमा सिंह 

मछलियां

  मैंने सुना था कभी  जैसे सुनी जाती है आती हुई ट्रेन की सीटी या सुनाया गया उलाहने की तरह कभी "एक मछली करती है पूरा तालाब गन्दा" मैंने केवल सुना था जाना नहीं अब जाना एक मछलीसे गढ़े जा सकते है प्रेम प्रतिमान बदले जा सकते है चेहरे पानी के बिना एक मछली फिसल सकती है तुम्हारी आत्मा के सहारे एकांत मे एक मछली ढ़ो सकती है तुम्हारे देवता को बचा सकती है इंसान होने से समूची पृथ्वी के साथ एक मछली डूब सकती है बिना आक्सीजन के बढ़ा सकती है पानी मे आक्सीजन की मांग एक मछली बचा सकती है प्रलय के समय तुम्हे पूरी पृथ्वी समेत ये एक मछली निश्चित ही बची रहनी चाहिए तालाब मे मै खोज रही हूँ इसे आस पास के तालाब मे सारी मछलिया  तैर गई है जल मे दूर तक फैल रही है संडाध सारे तालाब दिख रहे गंदे आखिर कहा होगी वो एक मछली इन मरी हुई मछलीयों के बीच ¡ गरिमा सिंह 

एक टुकड़ा दुःख

  मेरे पास एक टुकड़ा दुःख था बादल की तरह मन मे तिर रहा था थी एक मुट्ठी भर धूप जिसे मैंने छुपाये रखा मेरे पास एक टोकरी भरे चेहरे थे सूखे से मरियल कुम्हालाये हुए जिसे कमर दाहिने टेक लगाए हुए मै निकल जाती हूँ किसी नायिका की तरह जिसके पास खोने को बस धूप है साथ चलने को एक टुकड़ा बादल मेरे साथ कालिदास की शकुंतला भी प्रथम स्पर्श से अभिभूत चलती है दुष्यंत की याद मे खोई खोई अनमनी सी वह श्रापित भी होकर अनजान रही उसे नहीं याद है कोई धूप न कोई बादल का टुकड़ा नहीं जमीन पर उगी घास जो चल रहे है उसके साथ उसके भीतर एक दरिया है बहता हुआ छलकता हुआ उसी मे जलेगी आग चुपके से वो भी धीरे धीरे चुनेगी चलते हुए धरती के दुःख रखेगी एक टोकरी मे उठाएगी सिर पर आखिर वह भी है प्रेम मे डूबी स्त्री उसके पास भी होगा उसके हिस्से का बादल का टुकड़ा और एक मुट्ठी धूप अंत मे। स्वरचित -गरिमा सिंह 

सबसे जरूरी है नींद

  सबसे जरूरी है नींद ========≠=== मुझे बताया गया सबसे जरूरी है नींद नींद न आने पर सपने भी नहीं आते मुझे सपने बहुत पसंद है जिसे देखना सुखद है मै सो गई सबसे जरूरी थी नींद मै आज इतने दिन बाद भी सपने देख रही बस सपने गहरी नींद मे मैंने देखा मेरी तरह सबने मान लिया नींद बहुत जरूरी है सब सो रहे है सपने देखने के लिए सपनों की खरीद फरोख्त मे मे शामिल था वह अकेला आदमी जिसने बताया था सबको नींद जरूरी है सपनों के लिए ¡ --------=-गरिमा सिंह 

बुनते हुए सन्नाटा

  रात मे खोलती हूँ खिड़की दूर तक सन्नाटा पसरा है स्याह चेहरों की तरह चेहरों पर स्याह रंग और सन्नाटा रात को गहराता है खिड़कियों से अंदर झाँकता है अंधेरा मेरे कानो से उतर जाता है मन मे जागते हुए भी स्याह चेहरों के गिरफ्त मे हूँ सन्नाटे यूँ ही नहीं बनते पहले बनती है रात उसमे फ़ैलते है स्याह रंग फिर गुजरता है आदमी चुपचाप बंद करता है किवाड खोलता है खिड़की जागते हुए देखता है रात भर बाहर धीरे धीरे सन्नाटे को अपने भीतर उतरता है धुए की तरह रात मे जागता हुआ आदमी बस जागता नहीं उसकी आँखों मे नींद के साथ जागते है कई ख्वाब जो उसके भीतर से गुजरे है सन्नाटे की तरह मै जानती हूँ सन्नाटा केवल रात मे नहीं होता यह होता है आदमी के भीतर भी जो रात के सन्नाटे से मिल जाता है पूरे दिमाग़ को भर देता है एक खालीपन से जो रात के इस सन्नाटे से कही ज्यादा भयावह है आदमी के लिए ¡ --------------गरिमा सिंह 

मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ

  मैं नहीं मानती तुम्हारी सब बातें नहीं मिलाती हाँ मे हाँ जरूरत भर ही सुनती हूँ तुमको अब तरेरती आँखों के आगे नहीं झुकती मेरी आँखे नहीं लड़खड़ाते मेरे कदम नहीं कांपती ज़ुबान हमेशा निकल जाती हूँ तुमसे चार कदम आगे तुम पीछे से फेंकते हो कंकड़ पूरे जोर से जो नीचे गिर जाते हैं मैं किसी दिन कछुए की तरह अपनी पीठ पर लदे बोझ को उतार कर फेंक दूँगी या किसी दिन समूची पृथ्वी समेत मै डूब जाउंगी समुद्र मे निकलूंगी खोल से बाहर मै जानती हूँ मेरी बातें अटक जाती है तुम्हारे गले मे काटें की तरह मुझे निगलना नहीं है तुम्हारे लिए आसान तुम कहते हो मै नहीं हूँ अच्छी लड़की मै जानती हूँ तुम कहना चाहते हो मै तुम्हारे पहुंच से बाहर हूँ मै बिल्कुल अच्छी लड़की नहीं हूँ ¡ ==≠=====गरिमा सिंह