मेरे पास एक टुकड़ा दुःख था बादल की तरह मन मे तिर रहा था
थी एक मुट्ठी भर धूप
जिसे मैंने छुपाये रखा
मेरे पास एक टोकरी भरे चेहरे थे
सूखे से
मरियल कुम्हालाये हुए
जिसे कमर दाहिने टेक लगाए हुए
मै निकल जाती हूँ
किसी नायिका की तरह
जिसके पास खोने को बस धूप है
साथ चलने को एक टुकड़ा बादल
मेरे साथ कालिदास की शकुंतला भी
प्रथम स्पर्श से अभिभूत चलती है
दुष्यंत की याद मे
खोई खोई अनमनी सी
वह श्रापित भी होकर अनजान रही
उसे नहीं याद है कोई धूप
न कोई बादल का टुकड़ा
नहीं जमीन पर उगी घास
जो चल रहे है उसके साथ
उसके भीतर एक दरिया है
बहता हुआ छलकता हुआ
उसी मे जलेगी आग चुपके से
वो भी धीरे धीरे चुनेगी चलते हुए
धरती के दुःख
रखेगी एक टोकरी मे
उठाएगी सिर पर
आखिर वह भी है प्रेम मे डूबी स्त्री
उसके पास भी होगा उसके हिस्से का
बादल का टुकड़ा
और एक मुट्ठी धूप
अंत मे।
स्वरचित -गरिमा सिंह

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