प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर
तुम्हारे पास होकर भी
कविता में लिखती रही विरह
मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी
जिसे छज्जे से निहारना है
दूर से आते प्रेमी को
जिसे केशो में गूथ लेना है
धरती पर गिरे सारे फूलों को
जिसे अभिसारिका बनने से बचना है
बचाना है प्रेम
मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था
तुम्हारा होना था प्यार मे
तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह
तुम्हे होना था सूरजमुखी
मुँह किये विपरीत दिशा में
जागना था अंतिम कल्प तक
यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था
एक धागा था
जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था
जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया
वो पहली कभी नहीं रही
उसके होने में प्यार था
तुम्हारे होने में दुःख
मैंने लिखने मे दुःख को चुना
करने में प्यार को
एक बात समझ नहीं आई
मेरे प्रेम करने के साथ
ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में
अफ़सोस दुःख ने सेंध लगा लिया
तुम्हारे ख़ुशी के बहाने
मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख
जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं
मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं
प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है
हाथ में हाथ लिए
कभी न विछड़ने के वादे के साथ।
गरिमा सिंह

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