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एक प्रेममय स्वरचित गीत :जो मन को प्रेमभाव से भर देगा

 तुम बिन कैसे गीत सुनाऊं 

मन को फिर कैसे समझाऊं।

गीत तुम्हारे
राग तुम्हारे
जीवन के सब स्वांग तुम्हारे
तुम से रोना तुम से हसना
तुम बिन जीवन कितना सूना
कैसे तुम बिन साज सजाऊं
मन को फिर कैसे समझांऊ।

सपनो के हर बिम्ब मे तुम हो
जीवन के हर लय मे तुम हो
साँसो की ये डोर तुम्ही से
तुम बिन जीवन पल -पल रीता
कैसे तुम बिन फिर मुस्काउ
मन कैसे फिर समझाऊ।

मन के सारे गीत गुजर गए
जीवन के सब मीत मुकर गए
जीवन की हर छोटी बाते
छंदो जैसे हमको कर गए
दरिया का पानी भी साथी
धीरे -धीरे यूं उतर गए
कैसे तुम बिन फिर मुस्काउं
मन को फिर कैसे समझाऊ।

भूली बिसरी सारी यादें
जीवन को बहला जाती है
मन सलिला को तेरी यादें
पत्थर सा लहरा जाती है।
विचलित मन चंचल सा जीवन
झंझा भरी कहानी लेकर
जीवन पथ पर कैसे जाऊं
मन को फिर कैसे समझाऊं।

गरिमा सिंह
(2)   
(एक कविता जिसके माध्यम से अपने अन्तः मन की गहरी यात्रा का संकेत है, मनुष्य पूरे संसार को जानने और अपने अधीन करने को लालायित होता है, बाहर की सभी चीजों को जानता और समझता है लेकिन खुद से खुद की दूरी तय करना एक कठिन कार्य बन जाता है )


कितना कठिन है 

खुद को देखना,
समझना,
अंतर्मन छूना
ठीक वैसे ही
जैसे एक माँ
लगाती है कयास
अपने अजन्मे बच्चे का,
उसके नन्हें हाथों
और पैरों की अंगुलियों को
अपने गालों पर महसूस कर
रोमांचित होती है,
ठीक उसी तरह जैसे
एक नवविवाहिता के
हाथ कांप उठते है
प्रथम स्पर्श को यादकर,
ऐसा ही कुछ होता है
तय करना
खुद से खुद की दूरी,
अपने आँखों में उतरना
असीम होकर,
और फिर विखेर देना
कुछ भी हो
कठिन तो है। 

          -गरिमा सिंह 

दूरियां 

====
दूरियां हमेशा रही है अमिट
कुछ दूरियां वक़्त ने खींच दी,
कुछ के निशान कदमो ने बनाये,
जिससे कुछ लोग पहुंच गए हासिये पर
दूरियां बन गई खाई,
जिसे पाटने की कोशिश मे
समा गए कुछ रास्ते इसमें,
और कुछ शर्ते भी,
जिसकी बुनियाद कमजोर थी,
दो कदम की इस दूरी को तय करना
बन गया क्षितिज की तरह,
कितना भी चले,
ये बढ़ती ही गई आकाश की तरह,
कभी छल से मिट गई थी दूरियां,
तीन पग मे नाप लिया गया था
पूरी धरती, पूरा आकाश और पाताल
अब ये तीन पग खीच गए है दूरियां
जन्म जन्मांतर की,
जिसे पाटने के लिए फिर
कोई विष्णु अवतार लेगा,
फिर ली जाएगी किसी की परीक्षा,
मुमकिन है,
कोई समुद्र मंथन फिर हो,
एक तरफ हो राक्षस दूसरी ओर देवता,
और निकाले जाये कई रत्न,
जो यथोचित स्थान ले,
विष को फैला दिया जाय
आकाश के नीले रंग मे बूँद, बूँद.
और अमृत को कोई शिव अकेले धारण कर ले,
दूर ख़डी भीड़ देखती रह जाय
कुछ मानक बदल दिए जाय
बिना कसौटी के,
कुछ सवाल उठाये जाय
जिनका जवाब न भीड़ के पास हो






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