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शहर दर शहर


 कितने शहर जागते है मेरे भीतर

एक साथ मन के विस्तर पर
चुपचाप बदलते है करवट
यादों का एक पुलिंदा रखे सिरहाने
मुझे भी दिखाते है कई दृश्य

कई शहरो मे भटकते हुए
टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर बैठ जाती हूँ
उनकी गलियाँ तंग है बहुत
सिसकियाँ लेते हुए जार जार
एक बच्चे की तरह
कितने शहर लिपट गए है
मेरी आत्मा से
और ताकतें है मेरी आँखों मे
जैसे देख लिया हो कोई मनपसंद खिलौना
पोंछते हुए आंसू मासूम सी हँसी बिखर जाती है

वो शहर  जहाँ मैने देखा था
पहली बार जीवन को पलते हुए
बहुत नजदीक से ढलते हुए  एक शाम
और जाना था सब कुछ ढलता है
शहर कोई भी हो
सबके पास अपनी शाम होती है
अपने तरह की एक सुबह भी

सब कुछ था खुशनुमा एक चाँद की तरह
वह शहर मुझे पहचानता था मुझसे ज्यादा
सारे फूल मेरे दोस्त थे
कोयल के साथ कूकते हुए
घंटो हॅसते थे अनायास

वो शहर जहाँ घर से ज्यादा किताबें पसंद थी
बस्ते मे पूरा शहर समा जाता था
किसी उपन्यास से निकलकर नायक
धीरे से पकड़ता था हाथ
ले जाता था कल्पना लोक मे
चेहरे की लालिमा अचानक बढ़ जाती थी
तितलियाँ आ जाती थी थोड़ा पास

कई शहर बदले मेरे भीतर
कई चेहरे इन शहरों मे खोते रहे
हर शहर से अलग होते हुए लगा
आगे सब खत्म होगा
नहीं बचेगा कोई रास्ता कोई नायक
नहीं आएगा किसी किताब से निकलकर

मुझे लगता है अब मै किसी शहर मे नहीं रहती
माफ करियेगा मै अब अपने ही बनाये शहर मे रहती हूँ
जिसकी सूरत तुम्हारे किसी शहर से नहीं मिलती
कई शहर रहते है मेरे भीतर
जो बारी बारी से आते है बाहर
मुझे एक दिन मे कई कई शहरों मे होना है
कई शहरों को मेरा घर होना है।

गरिमा सिंह 

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