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 सबसे जरूरी बात

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तुमसे मिलने के बाद
कई बार लगा कि-
जरूरी नहीं है  तुम्हारा हाथ पकड़ कर
ये बीच की सड़क पार करना
जो आ गई है मेरे और तुम्हारे बीच
या हम खड़े कर दिए गए हैं
इसके दो समानांतर किनारों पर

बस जरूरी है  गुजरते हुए तुम्हे देखना
पीछे मुड़कर एक स्मित के साथ
और कानो की बाली का अचानक मुड़ जाना
तुम्हारी ओर कैद करने को तस्वीर
तुम कहते थे -हसरत से देखी गई चीजें
कभी दूर नहीं जाती हैं

कई बार काम की बातों में
कुछ भी काम का नहीं होता था
बस सुनना था तुम्हे
अपने भीतर उतारने के लिए बहुत गहरे
तुम्हारे पीठ पर अंगुलियों से बना रही थी
अपने नाम का पहला अक्षर
जो अंकित हो जाये मन की स्क्रीन पर

फोन रखते हुए अंगुलियों में उतर आते थे प्राण
गूंजते थे कानों में शब्द अनसुने संगीत की तरह
मन दुहराता था एक बच्चे की तरह
वर्ण माला के सीखे  गए नए अक्षरों को
जो बोल देता है शब्द कोश के बाहर के शब्द
जिसके अर्थ बने ही नहीं अब तक
काम की कई बातों में बहुत कुछ
तुम्हारे काम का नहीं था

फिर भी
तुम ले आये मखमली सी एक शाम
अपनी खूबसूरत आँखों की तरह
जहाँ नदी थी,-- रेत थी--
तुम भी थे--और ---
तुम प्रेमी भी नहीं थे तब तक , बस साथी थे शाम के
शाम जो तुम्हारी तरह थी
चुप 'इतनी शांत कि खलल पड़े साँसो का

तुम चलते रहे साथ नदी के
संगीत के सप्तस्वरों की कदमताल में
कभी कोई स्वर बहुत गहरा होकर रुक जाता था
कभी इतना धीमा स्वर की खुद से ही पूछना -
कुछ कहा आपने?
और एक लम्बी सांस पर रुक जाना अचानक
मेरे भीतर की नदी तोड़ देना चाहती थी एक बंध
और भीगा देना चाहती थी तुम्हारे कपड़े
हाथ पकड़ लेना चाहते थे
तुम्हारा मज़बूत हाथ
मन का पूरा आकाश भरभरा कर
गिर जाना चाहता था तुम्हारे कंधो पर
जिसे तुम समेट लेते और बचा लेते बिखरने से

अब तक कम समय ने तय किया था
जन्म -जन्मांतर की दूरी को
फिर भी
सबसे जरूरी बात अभी रह गई थी
जिसे  कई बार दुनिया में कहा गया
बड़े अदब के साथ
सबसे कठिन समय में
मैंने कहा था उस दिन बिना प्रसंग
फोन रखने से ठीक पहले

सुनिए--- -एक जरूरी बात कहनी है
---------
बोलो ---=
"मै प्यार करती हूँ आपसे '
और मेरा मन दुहराने लगा नई भाषा
जिसमें प्यार का कोई विकल्प नहीं
किसी प्रश्न के चारों जवाब एक ही थे
और तुम्हे जवाब बनाने की भी आजादी थी
आज कई दिनों बाद -
तुम पुल के पास खडे मेरे साथ
देख रहे हो आधा चाँद
मेरी आँखों में देखतेहुए धीरे से कहा-
" नदी कितनी गहरी है ना--
तुम्हे तैरना आता है "--
--
--नहीं डूबना जानती हूँ --
और मै हँस पड़ी थी तुम्हारे साथ
तुमने कोई जवाब नहीं बनाया था
चुना था मन ही मन एक विकल्प
नई सीखी भाषा का

चाँद बीच आसमान पर टंगा था
शहर एक बेरोजगार की तरह लौट आया था
तलाश कर सारे विज्ञापन
नदी थोड़ी उदास होने लगी थी लौटते हुए
तुम्हे भी लौटना था इस रात में
मुझे भी जाना था सड़क पार कर अकेले
हम नहीं कर सकते एक साथ
शहर की कोई सड़क पार
तुम नहीं रोक सकते थे मुझे हाथ पकडकर


तुमने कहा -सुनो
एक बहुत जरूरी बात कहनी है तुमसे
मेरे भीतर नदी जाग उठी अचानक
और मेरे पूरे वजूद ने सुना-

-"मै तुमसे इश्क करने लगा हूँ"

ये बात मेरे लिए जीवन की सबसे जरूरी बात थी
इतनी जरूरी थी जैसे चाँद और नदी

अब हर भाषा के हर प्रश्न में हमारा उत्तर
एक ही है, और कोई विकल्प  नहीं
अब कहते है अक्सर -
हमें एक जरूरी बात कहनी है-
(----------)
और चाँद नदी के ठीक ऊपर
पूरा खिल जाता है।


गरिमा सिंह

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