तुमसे मिली थी पहले भी कई बार
और तुमने औपचारिकता वशकई बार पूछा था यूँ ही -सब ठीक?
मैंने सिर हिलाया था कई बार
हाँ में सब ठीक करने की सहमति में
और मन नकार जाता था -सब कुछ ठीक कहाँ?
कितनी बार दिन में चलती रही बिना ठहरे
जिसे भटकना कह सकते है
और रात मुँह फुलाए बैठी रही
मेरी ओर पीठ किये
जिसे शायद रूठना कह सकते है
कितनी बार दरखतों से झाँक लेते है
फटे हुए बादल और सारे सौन्दर्यबोध
को झोंक देती हूँ सब कुछ ठीक होने के
बहाने के बीच में
न जाने कितनी बार एक चेहरा
मेरे दुःख का हिस्सेदार रहा और
वो मुझे ठीक से जानता भी नहीं था
उससे मुझे कई बार शिकायते रहीं
ये जानते हुए भी कि हर चेहरे पर
नहीं लिखा जा सकता है भरोसा
और हर आदमी नहीं जान सकता है
सब ठीक है " बोले जाने का उतार चढाव
वो नहीं माप सकता शब्द की गहराई को
आज फिर मै तुमसे मिली कई बार की तरह
तुमने पूछा -सब ठीक?
कई बार की तरह मैंने भी सिर हिलाया
सब कुछ ठीक है।
और बहुत जोर से हँसी ठहाके के साथ
भीतर कुछ खटाक से टूटा
मेरे कानो ने भी नहीं सुनी कोई आवाज़ तुम्हारी तरह
लेकिन दिन और रात को जरूर महसूस हुआ
और नदी को भी
अगली बार ज़ब मै तुमसे मिलूंगी
कई बार की तरह नहीं
पहली बार की तरह और बिना तुम्हारे
सवाल के मेरा जवाब "अब सब कुछ ठीक है "होगा।
और वो भी बिना किसी हिचकिचाहट के।
गरिमा सिंह
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें