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छल

 दृश्य में भीड़ है

भीड़ में एक चेहरा है
उस पर टिकी है हजारों नजरें
उम्मीद से भरी हुई
विस्मय से खींची हुई
बढ़ रही है नजरें उसके चारों ओर

भीड़ में अकेले चेहरे को
कोई फर्क नहीं पड़ता इस सवालों भरी नजरों से
वो जानता है सारे सवाल
उन सवालों का आधा इतिहास

उसी ने पैदा किये है सवाल
और भीड़ उलझ गई है
खोजने में उसके उत्तर
कई बार ऐसे ही भीड़ ने कई बार
उठाये सवाल,पहले भी

वो भीड़ किसी खाई में समा गई
अपने अनसुलझे सवालों की
फेहरिस्त के साथ

 

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