मै नदी हूँ
गुजर जाउंगी
तुम्हारे भीतर चुपचाप
नक्शे पर छोड़े बिना
कोई निशान
बिखरूंगी नहीं तुम्हारी आँखों में
क्षणिक सौंदर्य बनकर
किसी झरने की तरह
नहीं घिसना मुझे कोई पत्थर
न कोई शिवलिंग ही बनाऊंगी
जिसके सहारे तुम फिसलते रहे
मेरी आत्मा के किसी छोर पर
और मै ढोती रही अपने सिर पर
तुम्हारे किये का भार
मै किसी गंगा की तरह नहीं धोऊंगी
तुम्हारे पाप
तुम्हारे पुरखो को तारने
मै नहीं उतरूंगी धरती पर
किसी भागीरथ की तपस्या के जाल मे फंसकर
नहीं बधूँगी शिव की जटाओ में कभी
मै बदलते हुए रास्ते
गुजर नहीं जाउंगी
डुबाकर तुम्हारे सीमान्त
मै किसी समुद्र मे जाकर भी नहीं मिलूंगी
न कोई गार्ज ही बनाऊंगी
मै तुम्हारे भीतर एक सुराख़ कर
बहती रहूंगी अदृश्य
जिन्दा रहूंगी तुम्हारे इतिहास में
तुम्हारे भूगोलवेत्ता
खोजते थक जाएंगे
मेरा उदगम
मेरा अवसान
मै बहती रहूंगी अदृश्य
तुम्हारे हृदय में
सरस्वती नदी की तरह ¡
--गरिमा सिंह

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