जब सब लिख रहे थे हथियार
लिख रहे थे युद्धबोना चाहते थे दंगाई सीने मे बन्दूके
पत्थर बाजी सीख रहे थे
हाथों मे पकड़े हुए कलम
मैंने लिखा फूल
लिखा युद्ध का अधूरा अंत
बचाना सीखा अपना सिर
हाथों मे पकड़े हुए कलम
मैं भी लिखना चाहती थी एक फूल
एक तितली एक बगीचा
जब सब लिख रहे थे पीला पत्ता
जब सब महसूस कर रहे थे आग
जो फैली है चारों तरफ
सोख रही है पानी
उठ रहा है धुआँ
मैंने अंगुली से पानी पर बना दिया जंगल
जंगल से गायब है जानवर
गायब है पहाड़ नदी
जंगल से गायब है पेड़ भी
जब सब दौड़े जा रहे थे भूख कहते हुए
उस आखिरी छोर की ओर
जहाँ फ़सल खेतों मे जल रही है
जहाँ छूटे सांडो ने रौंद दिया है पूरा खेत
बची खुची कुछ फसले लाद दी गई है
शहर की ओर जाने वाली गाड़ी पर
मै ख़डी थी कागज को हाथ मे लिए
जहाज बनाकर हवा मे उडाने के लिए
जब कुछ लोग शांत है
एकदम चुप, बुत की तरह
मै तोडना चाहती हूँ चुप्पी
दागे गए गोले की तरह
उड़ा देना चाहती हूँ कविता अपनी
जिसमें मैंने हथियार की जगह गलती से
समझौता लिखा था।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें