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पिता होना

 कुछ भी नहीं रह सकता है अधूरा

सब लालायित है पूर्णता के लिए
भागती है नदी समुद्र की ओर
झरना किसी नदी की तलाश मे
बूंदे भी किसी गड्ढे की खोज मे
गिरती है
जो भी पूरा नहीं होता है जीवन मे
वो मन पर लिख जाता है
एक दुःस्वप्न की तरह
जिसकी याद से अक्सर नींद खुल जाती है

मेरा मन भी खोजता है
बच्चा होना
जिसका कोई पिता हो पूर्ण
जिसकी अंगुलियों को पकड़ा जा सके
कभी फिसलते हुए
कभी तेज चलते हुए
कभी पकड़ते हुए बस या कोई गाड़ी

मन अनेक बार एक छाँव खोजता है
वह किसी पेड़ के पास
ठहर जाना चाहता है कुछ देर
भले ही वह कुछ न सुनता हो
कुछ न समझाता हो


पिता का सानिध्य तलाशने मे
मुझे मिले कई प्रेमी कई बार जीवन मे
मैं नहीं बता पाई उनसे
कभी मन के स्पष्ट भाव
वो नहीं चुनते कभी पिता होने को
उनका प्रेमी होना ही उन्हें चुनना था

मेरा प्रेमी पिता की शक्ल मे ढल जाता है
जीवन मे कई बार उदास शामों मे
प्रेमी के गले लगकर रोते हुए
वह बदल गया पिता मे
उसकी अंगुलियों मे मैंने महसूस किया वात्सल्य

कई बार उसके पास होकर
माथे को चूमते हुए
लरजते है  होंठ मेरे
कुछ दिनों बाद गिर जातीहै कोई महीन चादर
जो दीवार का काम करती थी

मेरा अधूरा पिताअब भी
मेरे प्रेमी के चेहरे से झाँक लेता है कभी
वो मुझे परेशान करता रहा हमेशा
धीरे धीरे सोते हुए पति के
सीने मे उतरने लगा रात के अंधेरे मे
पिता का चेहरा
मै जब भी किसी दुःख से रोइ
पिता के ही गले लगकर रोइ
भले ही मेरा सिर मेरे पति के कंधे पर पड़ा होता

कई बार महसूस किया
कितना कठिन है पिता होना
जबकि प्रेमी होने को तैयार
कई चेहरे किसी के पिता भी होते है।

---

गरिमा सिंह 

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