मैं नहीं मानती तुम्हारी सब बातें नहीं मिलाती हाँ मे हाँ
जरूरत भर ही
सुनती हूँ तुमको अब
तरेरती आँखों के आगे
नहीं झुकती मेरी आँखे
नहीं लड़खड़ाते मेरे कदम
नहीं कांपती ज़ुबान
हमेशा निकल जाती हूँ
तुमसे चार कदम आगे
तुम पीछे से फेंकते हो
कंकड़ पूरे जोर से
जो नीचे गिर जाते हैं
मैं किसी दिन
कछुए की तरह अपनी पीठ पर
लदे बोझ को
उतार कर फेंक दूँगी
या किसी दिन समूची पृथ्वी समेत
मै डूब जाउंगी समुद्र मे
निकलूंगी खोल से बाहर
मै जानती हूँ मेरी बातें
अटक जाती है
तुम्हारे गले मे
काटें की तरह
मुझे निगलना नहीं है
तुम्हारे लिए आसान
तुम कहते हो मै नहीं हूँ
अच्छी लड़की
मै जानती हूँ
तुम कहना चाहते हो
मै तुम्हारे पहुंच से बाहर हूँ
मै बिल्कुल अच्छी लड़की नहीं हूँ ¡
==≠=====गरिमा सिंह

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