सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ


 मैं नहीं मानती तुम्हारी सब बातें

नहीं मिलाती हाँ मे हाँ
जरूरत भर ही
सुनती हूँ तुमको अब

तरेरती आँखों के आगे
नहीं झुकती मेरी आँखे
नहीं लड़खड़ाते मेरे कदम
नहीं कांपती ज़ुबान

हमेशा निकल जाती हूँ
तुमसे चार कदम आगे
तुम पीछे से फेंकते हो
कंकड़ पूरे जोर से
जो नीचे गिर जाते हैं

मैं किसी दिन
कछुए की तरह अपनी पीठ पर
लदे बोझ को
उतार कर फेंक दूँगी
या किसी दिन समूची पृथ्वी समेत
मै डूब जाउंगी समुद्र मे
निकलूंगी खोल से बाहर

मै जानती हूँ मेरी बातें
अटक जाती है
तुम्हारे गले मे
काटें की तरह

मुझे निगलना नहीं है
तुम्हारे लिए आसान

तुम कहते हो मै नहीं हूँ
अच्छी लड़की
मै जानती हूँ
तुम कहना चाहते हो
मै तुम्हारे पहुंच से बाहर हूँ
मै बिल्कुल अच्छी लड़की नहीं हूँ ¡

==≠=====गरिमा सिंह 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक प्रेममय स्वरचित गीत :जो मन को प्रेमभाव से भर देगा

 तुम बिन कैसे गीत सुनाऊं  मन को फिर कैसे समझाऊं। गीत तुम्हारे राग तुम्हारे जीवन के सब स्वांग तुम्हारे तुम से रोना तुम से हसना तुम बिन जीवन कितना सूना कैसे तुम बिन साज सजाऊं मन को फिर कैसे समझांऊ। सपनो के हर बिम्ब मे तुम हो जीवन के हर लय मे तुम हो साँसो की ये डोर तुम्ही से तुम बिन जीवन पल -पल रीता कैसे तुम बिन फिर मुस्काउ मन कैसे फिर समझाऊ। मन के सारे गीत गुजर गए जीवन के सब मीत मुकर गए जीवन की हर छोटी बाते छंदो जैसे हमको कर गए दरिया का पानी भी साथी धीरे -धीरे यूं उतर गए कैसे तुम बिन फिर मुस्काउं मन को फिर कैसे समझाऊ। भूली बिसरी सारी यादें जीवन को बहला जाती है मन सलिला को तेरी यादें पत्थर सा लहरा जाती है। विचलित मन चंचल सा जीवन झंझा भरी कहानी लेकर जीवन पथ पर कैसे जाऊं मन को फिर कैसे समझाऊं। गरिमा सिंह (2)    (एक कविता जिसके माध्यम से अपने अन्तः मन की गहरी यात्रा का संकेत है, मनुष्य पूरे संसार को जानने और अपने अधीन करने को लालायित होता है, बाहर की सभी चीजों को जानता और समझता है लेकिन खुद से खुद की दूरी तय करना एक कठिन कार्य बन जाता...

गीत

 रात को दिन, दिन को पहर कर दिया एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ खुल गए तेरे गेसू जो अंदाज से आसमानो पे बदली यूँ छाने लगी, खुल गई होंठ की पंखुड़ी जो तेरे कुछ कलियाँ यूँ ही मुस्कुराने लगी, ---- आज पतझड़ को तुमने चमन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---- चाँद उतरा मेरे आईने में फखत रौशनी गीत यूँ गुनगुनाने लगी, जुगनुओं ने की ऐसी कारीगरी रात आँचल को जैसे सजाने लगी, -------- धरा को ही तुमने, गगन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ वक़्त ठहरा रहा पांव चलते रहे रास्तों में मुझे बेबसी सी लगी, तुझको ढूँढा हर इक चेहरे में यूँ हर आगोश में बस कमी सी लगी, ----= फेरकर यूँ निगाहें करम कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---Garima singh 

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...