देश का रोना
एक बिल्ली के रोने से
उभर आईं हैं टेढ़ी -मेढ़ी लकीरें
मुहल्ले भर की औरतों के माथे पर
होंठ बुदबुदा रहें प्रार्थना के कमजोर शब्द
आँखे टिकी है किसी साकार पर
वो बचना चाहती हैं अपशकुन से
जो पैदा होती है बिल्ली के रोने मात्र से
वह नहीं रो सकती भूख से?
किसी वेदना से?
चिड़ियाँ मडराती है किसी पेड़ के पास
चीं चीं के शोर से भर जाता है आसमान
कुछ स्त्रियां रोती हैं झुण्ड में
दुःख अलग होने पर भी
उनकी संवेदना नहीं समाती भाषा में
अकेले पार्क में बैठा बूढा आदमी
कुर्ते की बांह से पोछता है आंसू
देखते हुए दूर छोटा बच्चा
वो रोज रख लेता है सिर पर हाथ
पढ़ते हुए सुबह का अख़बार
टहलता है सुनते हुए कोई पुराना गाना
भरते हुए लम्बी सांस
पिता बगीचे में ताकते हैं
कनेर के सबसे ऊपरी शाख पर खिला फूल
माँ रोती है सर्दी के बहाने से
कवि अपनी कविता में उगा रहा झरबेरी के पेड़
जिससे उलझते हैं उसके कपड़े
चलाते हुए विचारों की कैंची
निर्धारित करता है हँसने -रोने का समीकरण
विषुवतीय वनों में सुलग रही है आग
ध्रुवों पर बर्फ धीरे -धीरे पिघल रही है
भूगोलवेत्ताओं के माथे पर उभर रही है नसें
ओजोन परत में बढ़ रहा है छिद्र
मै अक्सर रोते रोते हँस देती हूँ
देश मेरा हँसते -हँसते रो देता है कई बार
बिल्ली के रोने से परेशान मुहल्ले की औरते
क्या कभी जान पाएंगी कि
देश का रोना बिल्ली के रोने से अलग नहीं है।
(4)
कवि बनने से पहले
जीने की तमाम शर्तो में
शामिल नहीं है कवि होना
कवि बनने से पहले
आदमी बनने की प्रक्रिया से
अनवरत गुजरना
समय के दहकते प्रश्नों से जले
तुम्हारे पैर नहीं जा सकते है बहुत दूर
उभर आये छालों के साथ नहीं चढ़ सकते सीढ़िया
शब्दों का जाल फेंककर
भावों का शिकार करने से बचना
किसी खून से मत रंगना अपने उत्तरीय
कवि होना रंगरेज़ हो जाना नहीं है
कविता! वो तो तुम्हारे माथे पर
झलक आएगी प्रस्वेद कणों की तरह
और ढुलक जाएगी आत्मा की आग तक
जिसमें तुम जलाते हो सिगरेट
और कश खींचते हुए किसी की ओर
फेंकते हो धुआँ
अपने भीतर के आदमखोर की
भूख मिटाने के लिए मत फेकना कोई निरीह भाव
जो निचोड़ दे तुम्हारी आत्मा का बचा खुचा रस
मत छुपाना दम्भ के संदूक में
अपने पीढ़ियों के सिरजे गए चेहरे
किसी स्प्रिंग की तरह दो अंगुलियों के बीच
दब जाने के बाद
इतनी ऊँची छलांग मत लगाना कि
उतर जाओ अपने ही चित्त से
कवि बनने की अंतहीनप्रक्रिया में
शामिल होने से पहले
आदमी बनने की प्रक्रिया से गुजरना
इस जद्दोजहद में यदि मर जाये
तुम्हारे भीतर कवि होने की लालसा
तो निराश मत होना
आदमी के भीतर ही पैदा होती है
सर्जना की सारी संकल्पना
दुनिया को आज कवियों से ज्यादा
आदमी की जरूरत है।
-गरिमा सिंह
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें