सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

देखना स्त्री को

 देखना स्त्री को

उतर कर कभीअपने ऊँचे मकान से
निकल कर बाहर चौखट के
बिना खटकाये साँकल
जब खुले हो मन के दरवाजे और
आँखों मे बहती हो कोई अदृश्य नदी या झरना
देखना उसे थोड़ा सा आँखों को मीचकर
बहुत पास से
क्यूंकि स्पष्ट दिखने के लिए जरूरी है
बराबरी पर बनना प्रतिबिम्ब

उसे छूना जब उतर जाये
तुम्हारे भीतर प्राण और अंगुलियों के
पोरो पर नहीं चटकती हो चिंगारी
जब चुक जाये तुम्हारे अनर्गल शब्द
तुम एक स्त्री को पाना
साँसो की तरह
जो मौजूद है साथ तब भी जब तुम
सोते हो गहरी नींद मे
तब भी जब स्थिर हो
जब भाग रहे हो बहुत तेजी से बचाने को अपना स्व
तब भी जब तुम्हे नहीं महसूस होती अपने भीतर
कोई उत्तेजना
वो रहती है हमेशा बिना कोई जगह घेरे
भीतर शांत,अडोल, मध्यम
सुषमना नाड़ी की तरह

उसे चाहो जैसे बुद्ध ने चाहा था ज्ञान को
और किया था महाभिनशक्रमण
राज पाट और अधिकार से ही नहीं
अपने होने के झूठे दम्भ से
अपने  निर्मित पुरुषतत्त्व से
और चखा था एक बहिस्कृत स्त्री के भोजन का स्वाद
गुजरे थे खुद के अंदर होने को एकात्म
और जाना था स्त्री नहीं
एक पुरुष के भीतर स्त्री का आभाव
हमें बनाता है रूढ़ और जड़

एक स्त्री को जानने से पहले खोल देना किवाड़
मत खटकाना सांकल और हो सके तो
करना इंतजार उसके लौटने का
एक प्रेयसी बनकर ¡


garima singh


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...

सब ठीक है

  तुमसे मिली थी पहले भी कई बार और तुमने औपचारिकता वश कई बार पूछा था यूँ ही -सब ठीक? मैंने सिर हिलाया था कई बार हाँ में सब ठीक करने की सहमति में और मन नकार जाता था -सब कुछ ठीक कहाँ? कितनी बार दिन में चलती रही बिना ठहरे जिसे भटकना कह सकते है और रात मुँह फुलाए बैठी रही मेरी ओर पीठ किये जिसे शायद रूठना कह सकते है कितनी बार दरखतों से झाँक लेते है फटे हुए बादल और सारे सौन्दर्यबोध को झोंक देती हूँ सब कुछ ठीक होने के बहाने के बीच में न जाने कितनी बार एक चेहरा मेरे दुःख का हिस्सेदार रहा और वो मुझे ठीक से जानता भी नहीं था उससे मुझे कई बार शिकायते रहीं ये जानते हुए भी कि हर चेहरे पर नहीं लिखा जा सकता है भरोसा और हर आदमी नहीं जान सकता है सब ठीक है " बोले जाने का उतार चढाव वो नहीं माप सकता शब्द की गहराई को आज फिर मै तुमसे मिली कई बार की तरह तुमने पूछा -सब ठीक? कई बार की तरह मैंने भी सिर हिलाया सब कुछ ठीक है। और बहुत जोर से हँसी ठहाके के साथ भीतर कुछ खटाक से टूटा मेरे कानो ने भी नहीं सुनी कोई आवाज़ तुम्हारी तरह लेकिन दिन और रात को जरूर महसूस हुआ और नदी को भी अगल...

लिखते हुए प्रेम

  तुमने मुझसे कहा - तुम मुझे अच्छी लगती हो मैं तुमसे प्यार करता हूँ मै चुप रही एकदम चुप मरने के बाद जैसे कोई चुप हो जाता है तुमने कहा - जवाब दो, कुछ कहो मैंने कहा -तुम भी मुझे अच्छे लगते हो लेकिन मै तुमसे प्यार नहीं कर पाऊँगी मेरे दोस्त, क्योंकि मैंने जब भी तुम्हे याद किया मेरे माथे की बिंदी बहुत भारी लगने लगी, एक लाल रंग की रेखा ठीक भौहो के बीच लुढ़क गई कई बार तुम्हारा नाम कागज पर यूँ ही लिखते हुए चूड़ियों ने मात्राओं की दिशा को बदल दिया तुम्हारे घर की ओर जाने वाले रास्ते पर अक्सर बज उठती है पायल आंखे गढ़ती हैं पाप और पुण्य की परिभाषा तुम्हारे चेहरे को एक परिचित चेहरा ढक लेता है रोज जिसे मै पूरे जोर से धकेलती हूँ बचाती हूँ तुम्हारी दो आँखे जिसमें छुपाती हूँ अनकहा प्रेम मेरे दोस्त!मै तुम्हे नहीं बता सकती कैसे कई हिस्सों मे रोज बट जाता है मेरा प्रेम और तुम्हारे हिस्से का मै छुपा लेती हूँ अँधेरी खोह मे। --गरिमा सिंह