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बुनते हुए सन्नाटा

 रात मे खोलती हूँ खिड़की


दूर तक सन्नाटा पसरा है
स्याह चेहरों की तरह

चेहरों पर स्याह रंग
और सन्नाटा रात को गहराता है

खिड़कियों से अंदर झाँकता है अंधेरा
मेरे कानो से उतर जाता है मन मे
जागते हुए भी
स्याह चेहरों के गिरफ्त मे हूँ
सन्नाटे यूँ ही नहीं बनते

पहले बनती है रात
उसमे फ़ैलते है स्याह रंग
फिर गुजरता है आदमी चुपचाप
बंद करता है किवाड
खोलता है खिड़की

जागते हुए देखता है रात भर बाहर
धीरे धीरे सन्नाटे को अपने भीतर उतरता है
धुए की तरह

रात मे जागता हुआ आदमी
बस जागता नहीं
उसकी आँखों मे नींद के साथ
जागते है कई ख्वाब
जो उसके भीतर से गुजरे है
सन्नाटे की तरह

मै जानती हूँ
सन्नाटा केवल रात मे नहीं होता
यह होता है आदमी के भीतर भी
जो रात के सन्नाटे से मिल जाता है

पूरे दिमाग़ को भर देता है
एक खालीपन से

जो रात के इस सन्नाटे से
कही ज्यादा भयावह है
आदमी के लिए ¡

--------------गरिमा सिंह 

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