सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जून, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नहीं गढ़ा जा सकता

  तुम्हारे साथ प्रेम के वो दिन मैंने देखा की एक चिड़िया की तरह फुर्र हो गया दूर टंगा आसमान में एक तारा मुझे देखता रहा तुम्हारी खाली आँखों में उस चिड़िया की परछाई उभर आई कई बार तुम्हारे साथ महसूस किया कि दुनिया में प्रेम करने की बहुत सी जगहे है जहाँ प्रेम उगता है घास की तरह तुमसे दूर होकर जाना प्रेम करने की बहुत कम जगहे बची है मखमली घास पर जगह जगह गिरे है चिड़िया के नाजुक पंख मुझे लगता है अब प्रेम मेरे लिए आसमान में टांगे गए अकेले तारे की तरह है जिसकी टिमटिमाती रोशनी में आँखे खोजती है तुम्हारा प्रेम सच है प्रेम के हर रूप में भाषा आड़े आ ही जाती है शब्द अक्सर दे जाते है धोखा मात्राएँ नहीं उठा पाती है भार मौन भी करता है अभिव्यक्ति बनता है प्रेम की शक्ति जीवन के सारे ताप इसमें उतर आते है चुपचाप चला आता है सारा अंधेरा याद की तरह हर आँखों ने पढ़ी अपनी भाषा हाथो ने उठाये ग्रंथ और सबने मिलकर हारकर एक दिन एलान कर दिया - नहीं गढ़ा जा सकता है प्रेम का निर्धारित व्याकरण। --गरिमा सिंह

मेरी पुस्तक विमोचन की कुछ झलकियां 🌹

 

मेरी कविता संग्रह "चाक पे माटी सा मन "का विमोचन सम्पन्न हुआ

  एक साहित्यिक यात्रा की शुरुआत मेरी कविता संग्रह "चाक पे माटी सा मन "से हुई है, जिसके विमोचन में हिन्दी साहित्य के कई बड़े कवियों ने शिरकत किया। इसके बाद लखनऊ में काव्य पाठ का सुअवसर मुझे मिला, जिसमें हिन्दी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जी से मुलाकात हुई, साथ ही जीवन सिंह जी , नमिता सिंह जी से भी परिचित हुई, ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे 😊 ,

देखते हुए बाहर

  अपने दायरे से झाँकना बाहर  निकलना खुद के घर से  घूमने अनदेखी गलियां  जिनके किनारो पर रहते है अनजान लोग  जिनके नाम नहीं जानते हम  जो हमें देखते है  जैसे दूर आकाश मे टंगा धूमकेतु  बाहर झांकना किसी खोल से   अभी अभी कठोर धरती की छाती चीरकर  निकला हो अंकुर जैसे  अपने से अनजान  समेटे पूरे वजूद की सम्भावना  जिस पर टिक सकता है आकाश  जिसके एक छोर पर रुक सकती  आधी धरती  जो समेट सकता है पहाड़ की गहरी जड़े  ये जानते हुए भी कि  उस पर बहुत देर तक नहीं टिक सकते पाँव  लड़खड़ा जाना शामिल है  चलने मे, दौड़ने मे रुकने मे  सब नहीं बदले जाने पर भी हमेशा  दायरे टूटते है एक हद तक  लांघते है घेरे खुद के  और बढ़ाते है एक कदम  उस अनजान गली की तरफ  वहाँ  खडी  एक अनजान रात भी  बढ़ा रही है अपने कदम सुबह की ओर  तुम्हारे साथ बढ़ा रही है  आगे।     ---=गरिमा सिंह 

गुजरते हुए लोग

  सुबह सुबह बिस्तर पर पार्क मे सड़कों पर चाय की दुकानों पर ऑफिस की कुर्सी पर अकेले कमरे मे बिखरा है जो आदमी वही दोपहर तक निढाल होकर लगा लेता है टेक शाम को खुद को समेटकर सड़को की रोशनी  मे बचकर निकलता है घर मे टी वी के चैनल बार बार बदलता है तौलिए को सोफे पर पटकता है बाथरूम का दरवाज़ा धड़ाम से बंद करता है बेवजह होता है नाराज आईने के सामने खड़ा होकर खुद को निहारता है जल्दी से कुर्ते की बटन बंद कर बाहर भागता है रात को नींद की गोली खाकर सोता है आदमी अपने भीतर न जाने क्या क्या खोता है। =Garima singh 

समय के आगे

  घर मे टंगी घड़ी अचानक मेरी निगाह उस पर पड़ी यूँ तो हमेशा देख लेती हूँ एक नजर बिना किसी काम के समय से मै कहीं नहीं रही चाहे जितना देख लूँ घड़ी समय मुझसे अक्सर छूट जाता है आज मैंने देखा और सोचा मै घड़ी की सेकेण्ड वाली सुई की तरह लगातार एक वृत्त मे घूम रही बिना कहीं पहुँचे एक दर्द के साथ जिसकी आवाज़ को अनसुना करते तुम बिना दिखे बस खिसक रहे हो घंटे की सुई की तरह बिना तुम्हारे पहुँचे मेरे चलने का कोई अर्थ भी तो नहीं मै तुम्हारे जीवन मे बस सेकेण्ड की सुई ही हूँ जो पूरा चलकर एक क्षण तुमसे मिलती जरूर है यही क्षण बस प्यार है-- जिसके लिए सदियों से मै डोल रही हूँ तुम्हारे ह्रदय मे टिक टिक टिक टिक।

लिखते हुए प्रेम

  तुमने मुझसे कहा - तुम मुझे अच्छी लगती हो मैं तुमसे प्यार करता हूँ मै चुप रही एकदम चुप मरने के बाद जैसे कोई चुप हो जाता है तुमने कहा - जवाब दो, कुछ कहो मैंने कहा -तुम भी मुझे अच्छे लगते हो लेकिन मै तुमसे प्यार नहीं कर पाऊँगी मेरे दोस्त, क्योंकि मैंने जब भी तुम्हे याद किया मेरे माथे की बिंदी बहुत भारी लगने लगी, एक लाल रंग की रेखा ठीक भौहो के बीच लुढ़क गई कई बार तुम्हारा नाम कागज पर यूँ ही लिखते हुए चूड़ियों ने मात्राओं की दिशा को बदल दिया तुम्हारे घर की ओर जाने वाले रास्ते पर अक्सर बज उठती है पायल आंखे गढ़ती हैं पाप और पुण्य की परिभाषा तुम्हारे चेहरे को एक परिचित चेहरा ढक लेता है रोज जिसे मै पूरे जोर से धकेलती हूँ बचाती हूँ तुम्हारी दो आँखे जिसमें छुपाती हूँ अनकहा प्रेम मेरे दोस्त!मै तुम्हे नहीं बता सकती कैसे कई हिस्सों मे रोज बट जाता है मेरा प्रेम और तुम्हारे हिस्से का मै छुपा लेती हूँ अँधेरी खोह मे। --गरिमा सिंह

फितरत

  मुझे गिराने मे कई लोग कई बार गिरे गिरते रहे उनके नीचे गिरने का हुनर मुझे आकृष्ट करता रहा एक दिन मैंने देखा एक थाली मे बैगन की तरह वो अब भी लुढ़क रहे है बार बार गिरने पर लुढ़कते हुआ आदमी बिन पेदी का लोटा बन जाता है एकदम खाली लेकिन फूला नहीं समाता उसका लुढ़कना ही जीवन का सार है इसके लिए सारी हदें पार करने को तैयार है। स्वरचित -गरिमा सिंह