अपने दायरे से झाँकना बाहर
निकलना खुद के घर से
घूमने अनदेखी गलियां
जिनके किनारो पर रहते है अनजान लोग
जिनके नाम नहीं जानते हम
जो हमें देखते है
जैसे दूर आकाश मे टंगा धूमकेतु
बाहर झांकना किसी खोल से
अभी अभी कठोर धरती की छाती चीरकर
निकला हो अंकुर जैसे
अपने से अनजान
समेटे पूरे वजूद की सम्भावना
जिस पर टिक सकता है आकाश
जिसके एक छोर पर रुक सकती
आधी धरती
जो समेट सकता है पहाड़ की गहरी जड़े
ये जानते हुए भी कि
उस पर बहुत देर तक नहीं टिक सकते पाँव
लड़खड़ा जाना शामिल है
चलने मे, दौड़ने मे रुकने मे
सब नहीं बदले जाने पर भी हमेशा
दायरे टूटते है एक हद तक
लांघते है घेरे खुद के
और बढ़ाते है एक कदम
उस अनजान गली की तरफ
वहाँ खडी एक अनजान रात भी
बढ़ा रही है अपने कदम सुबह की ओर
तुम्हारे साथ बढ़ा रही है
आगे।
---=गरिमा सिंह

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