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फितरत

 मुझे गिराने मे कई लोग

कई बार गिरे
गिरते रहे

उनके नीचे गिरने का हुनर
मुझे आकृष्ट करता रहा

एक दिन मैंने देखा
एक थाली मे बैगन की तरह
वो अब भी लुढ़क रहे है

बार बार गिरने पर
लुढ़कते हुआ आदमी
बिन पेदी का लोटा
बन जाता है


एकदम खाली

लेकिन फूला नहीं समाता
उसका लुढ़कना ही
जीवन का सार है
इसके लिए सारी हदें
पार करने को तैयार है।

स्वरचित -गरिमा सिंह



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