तुम बिन कैसे गीत सुनाऊं मन को फिर कैसे समझाऊं। गीत तुम्हारे राग तुम्हारे जीवन के सब स्वांग तुम्हारे तुम से रोना तुम से हसना तुम बिन जीवन कितना सूना कैसे तुम बिन साज सजाऊं मन को फिर कैसे समझांऊ। सपनो के हर बिम्ब मे तुम हो जीवन के हर लय मे तुम हो साँसो की ये डोर तुम्ही से तुम बिन जीवन पल -पल रीता कैसे तुम बिन फिर मुस्काउ मन कैसे फिर समझाऊ। मन के सारे गीत गुजर गए जीवन के सब मीत मुकर गए जीवन की हर छोटी बाते छंदो जैसे हमको कर गए दरिया का पानी भी साथी धीरे -धीरे यूं उतर गए कैसे तुम बिन फिर मुस्काउं मन को फिर कैसे समझाऊ। भूली बिसरी सारी यादें जीवन को बहला जाती है मन सलिला को तेरी यादें पत्थर सा लहरा जाती है। विचलित मन चंचल सा जीवन झंझा भरी कहानी लेकर जीवन पथ पर कैसे जाऊं मन को फिर कैसे समझाऊं। गरिमा सिंह (2) (एक कविता जिसके माध्यम से अपने अन्तः मन की गहरी यात्रा का संकेत है, मनुष्य पूरे संसार को जानने और अपने अधीन करने को लालायित होता है, बाहर की सभी चीजों को जानता और समझता है लेकिन खुद से खुद की दूरी तय करना एक कठिन कार्य बन जाता...
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