सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

समय के आगे


 घर मे टंगी घड़ी

अचानक मेरी निगाह उस पर पड़ी

यूँ तो हमेशा देख लेती हूँ एक नजर
बिना किसी काम के
समय से मै कहीं नहीं रही
चाहे जितना देख लूँ घड़ी

समय मुझसे अक्सर छूट जाता है
आज मैंने देखा और सोचा

मै घड़ी की सेकेण्ड वाली सुई की तरह
लगातार एक वृत्त मे घूम रही
बिना कहीं पहुँचे
एक दर्द के साथ

जिसकी आवाज़ को
अनसुना करते तुम
बिना दिखे बस खिसक रहे हो
घंटे की सुई की तरह

बिना तुम्हारे पहुँचे
मेरे चलने का कोई अर्थ भी तो नहीं

मै तुम्हारे जीवन मे बस
सेकेण्ड की सुई ही हूँ
जो पूरा चलकर एक क्षण
तुमसे मिलती जरूर है

यही क्षण बस प्यार है--
जिसके लिए सदियों से
मै डोल रही हूँ तुम्हारे ह्रदय मे
टिक टिक टिक टिक।

टिप्पणियाँ