सुबह सुबह बिस्तर पर
पार्क मे
सड़कों पर
चाय की दुकानों पर
ऑफिस की कुर्सी पर
अकेले कमरे मे
बिखरा है जो आदमी
वही दोपहर तक निढाल होकर
लगा लेता है टेक
शाम को खुद को समेटकर
सड़को की रोशनी मे
बचकर निकलता है
घर मे टी वी के चैनल
बार बार बदलता है
तौलिए को सोफे पर पटकता है
बाथरूम का दरवाज़ा
धड़ाम से बंद करता है
बेवजह होता है नाराज
आईने के सामने खड़ा होकर
खुद को निहारता है
जल्दी से कुर्ते की बटन बंद कर
बाहर भागता है
रात को नींद की गोली खाकर सोता है
आदमी अपने भीतर न जाने
क्या क्या खोता है।
=Garima singh

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