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छल

  दृश्य में भीड़ है भीड़ में एक चेहरा है उस पर टिकी है हजारों नजरें उम्मीद से भरी हुई विस्मय से खींची हुई बढ़ रही है नजरें उसके चारों ओर भीड़ में अकेले चेहरे को कोई फर्क नहीं पड़ता इस सवालों भरी नजरों से वो जानता है सारे सवाल उन सवालों का आधा इतिहास उसी ने पैदा किये है सवाल और भीड़ उलझ गई है खोजने में उसके उत्तर कई बार ऐसे ही भीड़ ने कई बार उठाये सवाल,पहले भी वो भीड़ किसी खाई में समा गई अपने अनसुलझे सवालों की फेहरिस्त के साथ  

देखना स्त्री को

  देखना स्त्री को उतर कर कभीअपने ऊँचे मकान से निकल कर बाहर चौखट के बिना खटकाये साँकल जब खुले हो मन के दरवाजे और आँखों मे बहती हो कोई अदृश्य नदी या झरना देखना उसे थोड़ा सा आँखों को मीचकर बहुत पास से क्यूंकि स्पष्ट दिखने के लिए जरूरी है बराबरी पर बनना प्रतिबिम्ब उसे छूना जब उतर जाये तुम्हारे भीतर प्राण और अंगुलियों के पोरो पर नहीं चटकती हो चिंगारी जब चुक जाये तुम्हारे अनर्गल शब्द तुम एक स्त्री को पाना साँसो की तरह जो मौजूद है साथ तब भी जब तुम सोते हो गहरी नींद मे तब भी जब स्थिर हो जब भाग रहे हो बहुत तेजी से बचाने को अपना स्व तब भी जब तुम्हे नहीं महसूस होती अपने भीतर कोई उत्तेजना वो रहती है हमेशा बिना कोई जगह घेरे भीतर शांत,अडोल, मध्यम सुषमना नाड़ी की तरह उसे चाहो जैसे बुद्ध ने चाहा था ज्ञान को और किया था महाभिनशक्रमण राज पाट और अधिकार से ही नहीं अपने होने के झूठे दम्भ से अपने  निर्मित पुरुषतत्त्व से और चखा था एक बहिस्कृत स्त्री के भोजन का स्वाद गुजरे थे खुद के अंदर होने को एकात्म और जाना था स्त्री नहीं एक पुरुष के भीतर स्त्री का आभाव हमें बनाता है...

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...

मै नदी हूँ

मै नदी हूँ गुजर जाउंगी तुम्हारे भीतर चुपचाप नक्शे पर छोड़े बिना कोई निशान बिखरूंगी नहीं तुम्हारी आँखों में क्षणिक सौंदर्य बनकर किसी झरने की तरह नहीं घिसना मुझे कोई पत्थर न कोई शिवलिंग ही बनाऊंगी जिसके सहारे तुम फिसलते रहे मेरी आत्मा के किसी छोर पर और मै ढोती रही अपने सिर पर तुम्हारे किये का भार मै  किसी गंगा की तरह नहीं धोऊंगी तुम्हारे पाप तुम्हारे पुरखो को तारने मै नहीं उतरूंगी धरती पर किसी भागीरथ की तपस्या के जाल मे फंसकर नहीं बधूँगी शिव की जटाओ में कभी मै बदलते हुए रास्ते गुजर नहीं जाउंगी डुबाकर तुम्हारे सीमान्त मै किसी समुद्र मे जाकर भी नहीं मिलूंगी न कोई गार्ज ही बनाऊंगी मै तुम्हारे भीतर एक सुराख़ कर बहती रहूंगी अदृश्य जिन्दा रहूंगी तुम्हारे इतिहास में तुम्हारे भूगोलवेत्ता खोजते थक जाएंगे मेरा उदगम मेरा अवसान मै बहती रहूंगी अदृश्य तुम्हारे हृदय में सरस्वती नदी की तरह ¡ --गरिमा सिंह 

पिता होना

  कुछ भी नहीं रह सकता है अधूरा सब लालायित है पूर्णता के लिए भागती है नदी समुद्र की ओर झरना किसी नदी की तलाश मे बूंदे भी किसी गड्ढे की खोज मे गिरती है जो भी पूरा नहीं होता है जीवन मे वो मन पर लिख जाता है एक दुःस्वप्न की तरह जिसकी याद से अक्सर नींद खुल जाती है मेरा मन भी खोजता है बच्चा होना जिसका कोई पिता हो पूर्ण जिसकी अंगुलियों को पकड़ा जा सके कभी फिसलते हुए कभी तेज चलते हुए कभी पकड़ते हुए बस या कोई गाड़ी मन अनेक बार एक छाँव खोजता है वह किसी पेड़ के पास ठहर जाना चाहता है कुछ देर भले ही वह कुछ न सुनता हो कुछ न समझाता हो पिता का सानिध्य तलाशने मे मुझे मिले कई प्रेमी कई बार जीवन मे मैं नहीं बता पाई उनसे कभी मन के स्पष्ट भाव वो नहीं चुनते कभी पिता होने को उनका प्रेमी होना ही उन्हें चुनना था मेरा प्रेमी पिता की शक्ल मे ढल जाता है जीवन मे कई बार उदास शामों मे प्रेमी के गले लगकर रोते हुए वह बदल गया पिता मे उसकी अंगुलियों मे मैंने महसूस किया वात्सल्य कई बार उसके पास होकर माथे को चूमते हुए लरजते है  होंठ मेरे कुछ दिनों बाद गिर जातीहै कोई महीन चादर जो द...

कृति बहुमत मे कविता

 

शहर दर शहर

  कितने शहर जागते है मेरे भीतर एक साथ मन के विस्तर पर चुपचाप बदलते है करवट यादों का एक पुलिंदा रखे सिरहाने मुझे भी दिखाते है कई दृश्य कई शहरो मे भटकते हुए टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर बैठ जाती हूँ उनकी गलियाँ तंग है बहुत सिसकियाँ लेते हुए जार जार एक बच्चे की तरह कितने शहर लिपट गए है मेरी आत्मा से और ताकतें है मेरी आँखों मे जैसे देख लिया हो कोई मनपसंद खिलौना पोंछते हुए आंसू मासूम सी हँसी बिखर जाती है वो शहर  जहाँ मैने देखा था पहली बार जीवन को पलते हुए बहुत नजदीक से ढलते हुए  एक शाम और जाना था सब कुछ ढलता है शहर कोई भी हो सबके पास अपनी शाम होती है अपने तरह की एक सुबह भी सब कुछ था खुशनुमा एक चाँद की तरह वह शहर मुझे पहचानता था मुझसे ज्यादा सारे फूल मेरे दोस्त थे कोयल के साथ कूकते हुए घंटो हॅसते थे अनायास वो शहर जहाँ घर से ज्यादा किताबें पसंद थी बस्ते मे पूरा शहर समा जाता था किसी उपन्यास से निकलकर नायक धीरे से पकड़ता था हाथ ले जाता था कल्पना लोक मे चेहरे की लालिमा अचानक बढ़ जाती थी तितलियाँ आ जाती थी थोड़ा पास कई शहर बदले मेरे भीतर कई चेहरे इन शहरों मे खो...