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मै नदी हूँ

मै नदी हूँ गुजर जाउंगी तुम्हारे भीतर चुपचाप नक्शे पर छोड़े बिना कोई निशान बिखरूंगी नहीं तुम्हारी आँखों में क्षणिक सौंदर्य बनकर किसी झरने की तरह नहीं घिसना मुझे कोई पत्थर न कोई शिवलिंग ही बनाऊंगी जिसके सहारे तुम फिसलते रहे मेरी आत्मा के किसी छोर पर और मै ढोती रही अपने सिर पर तुम्हारे किये का भार मै  किसी गंगा की तरह नहीं धोऊंगी तुम्हारे पाप तुम्हारे पुरखो को तारने मै नहीं उतरूंगी धरती पर किसी भागीरथ की तपस्या के जाल मे फंसकर नहीं बधूँगी शिव की जटाओ में कभी मै बदलते हुए रास्ते गुजर नहीं जाउंगी डुबाकर तुम्हारे सीमान्त मै किसी समुद्र मे जाकर भी नहीं मिलूंगी न कोई गार्ज ही बनाऊंगी मै तुम्हारे भीतर एक सुराख़ कर बहती रहूंगी अदृश्य जिन्दा रहूंगी तुम्हारे इतिहास में तुम्हारे भूगोलवेत्ता खोजते थक जाएंगे मेरा उदगम मेरा अवसान मै बहती रहूंगी अदृश्य तुम्हारे हृदय में सरस्वती नदी की तरह ¡ --गरिमा सिंह 

पिता होना

  कुछ भी नहीं रह सकता है अधूरा सब लालायित है पूर्णता के लिए भागती है नदी समुद्र की ओर झरना किसी नदी की तलाश मे बूंदे भी किसी गड्ढे की खोज मे गिरती है जो भी पूरा नहीं होता है जीवन मे वो मन पर लिख जाता है एक दुःस्वप्न की तरह जिसकी याद से अक्सर नींद खुल जाती है मेरा मन भी खोजता है बच्चा होना जिसका कोई पिता हो पूर्ण जिसकी अंगुलियों को पकड़ा जा सके कभी फिसलते हुए कभी तेज चलते हुए कभी पकड़ते हुए बस या कोई गाड़ी मन अनेक बार एक छाँव खोजता है वह किसी पेड़ के पास ठहर जाना चाहता है कुछ देर भले ही वह कुछ न सुनता हो कुछ न समझाता हो पिता का सानिध्य तलाशने मे मुझे मिले कई प्रेमी कई बार जीवन मे मैं नहीं बता पाई उनसे कभी मन के स्पष्ट भाव वो नहीं चुनते कभी पिता होने को उनका प्रेमी होना ही उन्हें चुनना था मेरा प्रेमी पिता की शक्ल मे ढल जाता है जीवन मे कई बार उदास शामों मे प्रेमी के गले लगकर रोते हुए वह बदल गया पिता मे उसकी अंगुलियों मे मैंने महसूस किया वात्सल्य कई बार उसके पास होकर माथे को चूमते हुए लरजते है  होंठ मेरे कुछ दिनों बाद गिर जातीहै कोई महीन चादर जो द...

कृति बहुमत मे कविता

 

शहर दर शहर

  कितने शहर जागते है मेरे भीतर एक साथ मन के विस्तर पर चुपचाप बदलते है करवट यादों का एक पुलिंदा रखे सिरहाने मुझे भी दिखाते है कई दृश्य कई शहरो मे भटकते हुए टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर बैठ जाती हूँ उनकी गलियाँ तंग है बहुत सिसकियाँ लेते हुए जार जार एक बच्चे की तरह कितने शहर लिपट गए है मेरी आत्मा से और ताकतें है मेरी आँखों मे जैसे देख लिया हो कोई मनपसंद खिलौना पोंछते हुए आंसू मासूम सी हँसी बिखर जाती है वो शहर  जहाँ मैने देखा था पहली बार जीवन को पलते हुए बहुत नजदीक से ढलते हुए  एक शाम और जाना था सब कुछ ढलता है शहर कोई भी हो सबके पास अपनी शाम होती है अपने तरह की एक सुबह भी सब कुछ था खुशनुमा एक चाँद की तरह वह शहर मुझे पहचानता था मुझसे ज्यादा सारे फूल मेरे दोस्त थे कोयल के साथ कूकते हुए घंटो हॅसते थे अनायास वो शहर जहाँ घर से ज्यादा किताबें पसंद थी बस्ते मे पूरा शहर समा जाता था किसी उपन्यास से निकलकर नायक धीरे से पकड़ता था हाथ ले जाता था कल्पना लोक मे चेहरे की लालिमा अचानक बढ़ जाती थी तितलियाँ आ जाती थी थोड़ा पास कई शहर बदले मेरे भीतर कई चेहरे इन शहरों मे खो...

सब लिख रहे है

  जब सब लिख रहे थे हथियार लिख रहे थे युद्ध बोना चाहते थे दंगाई सीने मे बन्दूके पत्थर बाजी  सीख रहे थे हाथों मे पकड़े हुए कलम मैंने लिखा फूल लिखा युद्ध का अधूरा अंत बचाना सीखा अपना सिर हाथों मे पकड़े हुए कलम मैं भी लिखना चाहती थी एक फूल एक तितली एक बगीचा जब सब लिख रहे थे पीला पत्ता जब सब महसूस कर रहे थे आग जो फैली है चारों तरफ सोख रही है पानी उठ रहा है धुआँ मैंने अंगुली से पानी पर बना दिया जंगल जंगल से गायब है जानवर गायब है पहाड़ नदी जंगल से गायब है पेड़ भी जब सब दौड़े जा रहे थे भूख कहते हुए उस आखिरी छोर की ओर जहाँ फ़सल खेतों मे जल रही है जहाँ छूटे सांडो ने रौंद दिया है पूरा खेत बची खुची कुछ फसले लाद दी गई है शहर की ओर जाने वाली गाड़ी पर मै ख़डी थी कागज को हाथ मे लिए जहाज बनाकर हवा मे उडाने के लिए जब कुछ लोग शांत है एकदम चुप, बुत की तरह मै तोडना चाहती हूँ चुप्पी दागे गए गोले की तरह उड़ा देना चाहती हूँ  कविता अपनी जिसमें मैंने हथियार की जगह गलती से समझौता लिखा था। गरिमा सिंह 

मछलियां

  मैंने सुना था कभी  जैसे सुनी जाती है आती हुई ट्रेन की सीटी या सुनाया गया उलाहने की तरह कभी "एक मछली करती है पूरा तालाब गन्दा" मैंने केवल सुना था जाना नहीं अब जाना एक मछलीसे गढ़े जा सकते है प्रेम प्रतिमान बदले जा सकते है चेहरे पानी के बिना एक मछली फिसल सकती है तुम्हारी आत्मा के सहारे एकांत मे एक मछली ढ़ो सकती है तुम्हारे देवता को बचा सकती है इंसान होने से समूची पृथ्वी के साथ एक मछली डूब सकती है बिना आक्सीजन के बढ़ा सकती है पानी मे आक्सीजन की मांग एक मछली बचा सकती है प्रलय के समय तुम्हे पूरी पृथ्वी समेत ये एक मछली निश्चित ही बची रहनी चाहिए तालाब मे मै खोज रही हूँ इसे आस पास के तालाब मे सारी मछलिया  तैर गई है जल मे दूर तक फैल रही है संडाध सारे तालाब दिख रहे गंदे आखिर कहा होगी वो एक मछली इन मरी हुई मछलीयों के बीच ¡ गरिमा सिंह 

एक टुकड़ा दुःख

  मेरे पास एक टुकड़ा दुःख था बादल की तरह मन मे तिर रहा था थी एक मुट्ठी भर धूप जिसे मैंने छुपाये रखा मेरे पास एक टोकरी भरे चेहरे थे सूखे से मरियल कुम्हालाये हुए जिसे कमर दाहिने टेक लगाए हुए मै निकल जाती हूँ किसी नायिका की तरह जिसके पास खोने को बस धूप है साथ चलने को एक टुकड़ा बादल मेरे साथ कालिदास की शकुंतला भी प्रथम स्पर्श से अभिभूत चलती है दुष्यंत की याद मे खोई खोई अनमनी सी वह श्रापित भी होकर अनजान रही उसे नहीं याद है कोई धूप न कोई बादल का टुकड़ा नहीं जमीन पर उगी घास जो चल रहे है उसके साथ उसके भीतर एक दरिया है बहता हुआ छलकता हुआ उसी मे जलेगी आग चुपके से वो भी धीरे धीरे चुनेगी चलते हुए धरती के दुःख रखेगी एक टोकरी मे उठाएगी सिर पर आखिर वह भी है प्रेम मे डूबी स्त्री उसके पास भी होगा उसके हिस्से का बादल का टुकड़ा और एक मुट्ठी धूप अंत मे। स्वरचित -गरिमा सिंह