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  क्षण === चलते हुए अचानक कुछ घटित होता है और आदमी भूल जाता है चलना बैठता है और उसको महसूस करता है जो उसके भीतर ही पैदा हुआ सहसा, तीव्रता से, अर्जुन के भीतर महाभारत के युद्ध मे अचानक आया रख दिया अस्त्र, जिससे गीता का ज्ञान प्रकट हुआ उस एक क्षण ने विराट ज्ञान से भर दिया आकाश एक दिन सिद्धार्थ के भी अंदर उतर आया यह क्षण रास्ते मे बीमार दुःखी वृद्ध को देखकर वो भी भूल गए चलना अभी तक नींद मे चलता हुआ आदमी जाग गया था किसी के अंदर कई बार जागता है हर बार घटित होती है एक क्रांति दूसरी बार सिद्धार्थ के अंदर उतरा पीपल के पेड़ के सहारे गहन अँधेरी रात मे बिजली की तरह अंतर्मन कौध गया वो बन गए बुद्ध बुद्ध के भीतर ये क्षण रोज उतरता है जिसे वो देखते थे मुस्कुरा कर वो भी जगता था एक बार क्षण भर को ऐसे ही सम्राट अशोक के मन मे कलिंग के युद्ध के दौरान पैदा हुआ ये क्षण रख दिया अस्त्र संघ की शरण मे लौट आया उस प्रकाश से समुद्र पार भी जगमगाया कहते है ये क्षण नितांत अकेले मे घटित होता है जब आँखे बाहर नहीं अंदर की ओर कर रही हो यात्रा कभी कभी जीवन के अंतिम समय मे घटित होता ...

आजादी गीत

 राष्ट्रवाद का भेद मिटाकर। राष्ट्रवाद का भेद मिटाकर। हमको भारत कहना होगा  आजादी के नए अर्थ हमको फिर से गढ़ना होगा। भारत की बलिवेदी पर। जिसने भी जान गवाई थी। जिसके के आंगन में आजादी दुल्हन बन कर आई थी। तुम क्या कीमत अदा करोगे? उनकी उस कुर्बानी का। जिसने खुद ही सीने में अपने अंगारे बोया था। कतरा कतरा लहू गिरा था आसमान भी रोया था। सन 57 वाला वह पन्ना फिर से हमको पढ़ना होगा। आजादी के नए अर्थ फिर से हमको गढ़ना होगा। केसरिया रंग रंगा हुआ है चुनरी अब भी धानी है। भगत सिंह की फांसी चीखें। आंखों में क्यों पानी है? पूछ रहा है लकुटी वाला कितनी दूर आजादी है। जिस गुलशन को लहू से सींचा  दामन उसका क्यों खाली है? आजाद बोस बिस्मिल जैसा फिर खून रगों में भरना होगा। आजादी के नए अर्थ  हमको फिर से गढ़ना होगा। बारूदों की चीख बने। जितने आंसू रोए हैं। फुटपाथ पर नींद बने। जितने सपने सोए हैं। उन तक कोई लौ ना पहुंची अब तक इन गलियारों से। वह क्या जाने जाति धर्म? जिनको सबने मिल लूटा है। उनकी आंखों में है मंदिर उनकी वाणी ही गीता है। उन खुली और खाली आंखों में स्वप्न नए भरना होगा। आजादी के नए अर्थ हमको ...

कविता

  वो एक दिन वो दिन जीवन में फिर दुबारा नहीं आया उस एक दिन मैं हँसी बिना बात के बिना किसी का मजाक उड़ाए मै रोई चीख कर, किसी ने पागल नहीं समझा उस दिन किसी ने कुछ नहीं पूछा किसी की आँखे अजनबी नहीं थी उस दिन सब कुछ सही जगह था किसी ने मेरा नाम भी नहीं पूछा उस दिन तुमने मुझे कहा दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री और चूम लिया था एक नीला फूल तुम्हारी आँखे देह से पार अनन्त मे टिक गई थी तुम्हारे पदछाप पर मैंने रखा अपना पैर जो एकदम मेरे पैर के माप का था एक सूत भी इधर उधर नहीं उस दिन सड़कें कम चिपटी थी आदमी होश मे चल रहे थे बच्चों के बसते उनके माँ बाप के हाथ मे झूल रहे थे बच्चे रास्ते के पत्थरों को ठोकर मारते उछलते जा रहे थे नहीं फटा था किसी का जूता किसी गाड़ी ने किसी के ऊपर कीचड भी नहीं उछाला उस दिन सब कुछ अलग था वो दिन कुछ खास था। स्वरचित -गरिमा सिंह 2) कुछ बदल गया ========== अपने दायरे से झाँकना बाहर निकलना खुद के घर से घूमने अनदेखी गलियां जिनके किनारो पर रहते है अनजान लोग जिनके नाम नहीं जानते हम जो हमें देखते है जैसे दूर आकाश मे टंगा धूमकेतु बाहर झांकना किसी ख...

एक खास दिन

  वो एक दिन वो दिन जीवन में फिर दुबारा नहीं आया उस एक दिन मैं हँसी बिना बात के बिना किसी का मजाक उड़ाए मै रोई चीख कर, किसी ने पागल नहीं समझा उस दिन किसी ने कुछ नहीं पूछा किसी की आँखे अजनबी नहीं थी उस दिन सब कुछ सही जगह था किसी ने मेरा नाम भी नहीं पूछा उस दिन तुमने मुझे कहा दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री और चूम लिया था एक नीला फूल तुम्हारी आँखे देह से पार अनन्त मे टिक गई थी तुम्हारे पदछाप पर मैंने रखा अपना पैर जो एकदम मेरे पैर के माप का था एक सूत भी इधर उधर नहीं उस दिन सड़कें कम चिपटी थी आदमी होश मे चल रहे थे बच्चों के बसते उनके माँ बाप के हाथ मे झूल रहे थे बच्चे रास्ते के पत्थरों को ठोकर मारते उछलते जा रहे थे नहीं फटा था किसी का जूता किसी गाड़ी ने किसी के ऊपर कीचड भी नहीं उछाला उस दिन सब कुछ अलग था वो दिन कुछ खास था। स्वरचित -गरिमा सिंह

चश्मा

  चश्मा ====== बचपन में अक्सर लगा लेती थी पिता का चश्मा किसी रिश्तेदार का भी जो घर की मेज पर उतार कर रख देते थे अपिरिचत आदमी का चश्मा भी मुझे बहुत भाता था पिता डांटते थे रखना चाहते थे चश्मे से दूर कभी शहर के मेले से कभी गाँव के मेले से खरीदे रंग -बिरंगे चश्मे इसकी एक खूबी थी जिस रंग का चश्मा उसी रंग का दृश्य धीरे धीरे चश्मे की आदत हो गई बिना चश्मे के सब कुछ दिखता था बेरंग मेरे पास कई चश्मे है घर का चश्मा बाजार का चश्मा ऑफिस का चश्मा इन दिनों मै चश्माघर में रहती हूँ आज मै सपने में भी खोज रही थी अपना चश्मा जो पड़ोस की छोटी बच्ची चुरा ले गई थी मै उससे छीन लेना चाहती हूँ चश्मा और चीख कर कहना चाहती हूँ पिता की तरह "चश्मे से तुम सबकी आँखे खराब हो जाएंगी ¡" स्वरचित -गरिमा सिंह 

शिकार

 एक स्त्री बहशी भीड़ की हिंसा की भेंट चढ़ गई उतार दिये गए उसके वस्त्र उसे नोचा गया मांस के लोथड़े की तरह  आखिर कौन थी यह स्त्री? किस जाति से, किस समुदाय से? उसका कोई परिचित चेहरा नहीं था भीड़ मे? उसकी आँखों में था डर, दुःख वह आधी आबादी का हिस्सा थी जो छुप गई थी धान के खेत में उसे बीच सड़क पर लाया गया था  यह सड़क कहाँ जाती थी? किसी ने सुना होगा राजपथ पर चीत्कार वहां एक आदमी भी था जिसने पूरी घटना को रिकॉर्ड किया यह  आदमी कौन था? सड़क पर हुई इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं  मै इन सबको नहीं जानती जानना भी नहीं चाहती मेरे जानने से फर्क भी नहीं पड़ता मेरे कहने का भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा  मै इस भीड़ को जानती हूँ भीड़ में कोई इंसान नहीं था  जिस तरह उसे नोंचा गया ये कुत्तों की प्रजाति के भी नहीं थे उसे टांग कर ले जाया गया ये गिद्ध भी नहीं थे इन्हें शेर भी नहीं कहा जा सकता ये सब झुण्ड में थे  इसमें एक भी पुरुष नहीं था ये सब आदम भेड़िये थे जो हमारे समाज में इंसान की शक्ल में छुपे रहते हैं समय समय पर इनके दांत और नाख़ून अचानक बड़े हो जाते है और ये झुण्ड में शिकार करने जंग...

गीत

 रात को दिन, दिन को पहर कर दिया एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ खुल गए तेरे गेसू जो अंदाज से आसमानो पे बदली यूँ छाने लगी, खुल गई होंठ की पंखुड़ी जो तेरे कुछ कलियाँ यूँ ही मुस्कुराने लगी, ---- आज पतझड़ को तुमने चमन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---- चाँद उतरा मेरे आईने में फखत रौशनी गीत यूँ गुनगुनाने लगी, जुगनुओं ने की ऐसी कारीगरी रात आँचल को जैसे सजाने लगी, -------- धरा को ही तुमने, गगन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ वक़्त ठहरा रहा पांव चलते रहे रास्तों में मुझे बेबसी सी लगी, तुझको ढूँढा हर इक चेहरे में यूँ हर आगोश में बस कमी सी लगी, ----= फेरकर यूँ निगाहें करम कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---Garima singh