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 क्षण


===
चलते हुए अचानक
कुछ घटित होता है
और आदमी भूल जाता है चलना
बैठता है और उसको महसूस करता है
जो उसके भीतर ही पैदा हुआ
सहसा, तीव्रता से,

अर्जुन के भीतर महाभारत के युद्ध मे
अचानक आया
रख दिया अस्त्र,
जिससे गीता का ज्ञान प्रकट हुआ
उस एक क्षण ने
विराट ज्ञान से भर दिया आकाश

एक दिन सिद्धार्थ के भी अंदर
उतर आया यह क्षण
रास्ते मे बीमार दुःखी वृद्ध को देखकर
वो भी भूल गए चलना
अभी तक नींद मे चलता
हुआ आदमी जाग गया था

किसी के अंदर कई बार जागता है
हर बार घटित होती है एक क्रांति
दूसरी बार सिद्धार्थ के अंदर उतरा
पीपल के पेड़ के सहारे
गहन अँधेरी रात मे
बिजली की तरह अंतर्मन कौध गया
वो बन गए बुद्ध
बुद्ध के भीतर ये क्षण रोज उतरता है
जिसे वो देखते थे मुस्कुरा कर
वो भी जगता था एक बार क्षण भर को

ऐसे ही सम्राट अशोक के मन मे
कलिंग के युद्ध के दौरान पैदा हुआ ये क्षण
रख दिया अस्त्र
संघ की शरण मे लौट आया
उस प्रकाश से समुद्र पार भी जगमगाया

कहते है ये क्षण नितांत अकेले मे घटित होता है
जब आँखे बाहर नहीं
अंदर की ओर कर रही हो यात्रा
कभी कभी जीवन के अंतिम समय मे
घटित होता है
जैसे सिकंदर को हुआ

यह क्षण तुम्हे खोजता है
उतर सके तुम्हारे भीतर कभी
तुमको तुमसे मिलाने के लिए
कभी गहरे प्रेम
गहरे दुःख
बहुत गहरे अवसाद
अकेलेपन मे भी
ये क्षण तुम्हारे भीतर उतरता है
और तुम रचते हो कालजयी साहित्य ¡
  
----Garima singh



(2)

विक्षोभ
==≠===

मै उठना चाहती हूँ
समुद्र मे एक लहर की तरह
जिसका पानी आने वाली
छोटी लहरों मे भी शामिल हो
जो लौटे किनारे से जीभ पर लेकर
नमक का स्वाद बीच समुद्र मे

नमक का बचा रहना
जरूरी है
सिर्फ किनारों पर नहीं
समुद्र की आत्मा मे भी
बचा रहना चाहिए थोड़ा नमक
जिससे बनाये जाये शरीर भी किनारों पर

मै जाना चाहती हूँ दबे पांव
रेत पर बिना छोड़े निशान
जिससे कोई नन्हा बच्चा
दौड़ न पड़े समुद्र की ओर
मै चाहती हूँ
मेरे कदमो के निशान को
लहरें मिटा दे
जैसे साफ किये गए हो
क़त्ल के बाद खून के धब्बे
कोई सबूत न बचे होने का

इन सबके बाद भी मै चाहती हूँ
समुद्र का अमावस अंधेरा
मै छुपा लूँ आसमान मे
और एक टुकड़ा चाँद
मै लौटा सकूँ बेचारे समुद्र को
जिसके लिए वह सदियों से उठता है
और गिरता है पछाड़ खाकर
एक हारे हुए प्रेमी की तरह

समुद्र मे नमक के साथ
बचा रखना चाहती हूँ प्रेम
थोड़ी सी गर्माहट
देना चाहती हूँ भोर का उजास

आखिर समुद्र की लहरें
हमारी छाती मे भी उठती हैं
गिरती है ज्वार भाटे की तरह ¡


Garima singh 



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