वो एक दिन
वो दिन जीवन में
फिर दुबारा नहीं आया
उस एक दिन मैं हँसी बिना बात के
बिना किसी का मजाक उड़ाए
मै रोई चीख कर, किसी ने पागल नहीं समझा
उस दिन किसी ने कुछ नहीं पूछा
किसी की आँखे अजनबी नहीं थी
उस दिन सब कुछ सही जगह था
किसी ने
मेरा नाम भी नहीं पूछा
उस दिन तुमने मुझे कहा
दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री
और चूम लिया था
एक नीला फूल
तुम्हारी आँखे देह से पार
अनन्त मे टिक गई थी
तुम्हारे पदछाप पर मैंने रखा अपना पैर
जो एकदम मेरे पैर के माप का था
एक सूत भी इधर उधर नहीं
उस दिन सड़कें कम चिपटी थी
आदमी होश मे चल रहे थे
बच्चों के बसते
उनके माँ बाप के हाथ मे झूल रहे थे
बच्चे रास्ते के पत्थरों को
ठोकर मारते उछलते जा रहे थे
नहीं फटा था किसी का जूता
किसी गाड़ी ने किसी के ऊपर
कीचड भी नहीं उछाला
उस दिन सब कुछ अलग था
वो दिन कुछ खास था।
स्वरचित -गरिमा सिंह

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें