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चश्मा

 चश्मा

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बचपन में
अक्सर लगा लेती थी
पिता का चश्मा
किसी रिश्तेदार का भी
जो घर की मेज पर
उतार कर रख देते थे

अपिरिचत आदमी का चश्मा भी
मुझे बहुत भाता था

पिता डांटते थे
रखना चाहते थे चश्मे से दूर

कभी शहर के मेले से
कभी गाँव के मेले से
खरीदे रंग -बिरंगे चश्मे

इसकी एक खूबी थी
जिस रंग का चश्मा
उसी रंग का दृश्य
धीरे धीरे चश्मे की आदत हो गई
बिना चश्मे के
सब कुछ दिखता था बेरंग

मेरे पास कई चश्मे है
घर का चश्मा
बाजार का चश्मा
ऑफिस का चश्मा
इन दिनों मै चश्माघर में रहती हूँ

आज मै सपने में भी
खोज रही थी अपना चश्मा
जो पड़ोस की छोटी बच्ची
चुरा ले गई थी

मै उससे छीन लेना चाहती हूँ चश्मा
और चीख कर कहना चाहती हूँ
पिता की तरह
"चश्मे से तुम सबकी आँखे खराब
हो जाएंगी ¡"

स्वरचित -गरिमा सिंह 

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