राष्ट्रवाद का भेद मिटाकर।
राष्ट्रवाद का भेद मिटाकर।
हमको भारत कहना होगा
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
भारत की बलिवेदी पर।
जिसने भी जान गवाई थी।
जिसके के आंगन में आजादी
दुल्हन बन कर आई थी।
तुम क्या कीमत अदा करोगे?
उनकी उस कुर्बानी का।
जिसने खुद ही सीने में
अपने अंगारे बोया था।
कतरा कतरा लहू गिरा था
आसमान भी रोया था।
सन 57 वाला वह पन्ना
फिर से हमको पढ़ना होगा।
आजादी के नए अर्थ
फिर से हमको गढ़ना होगा।
केसरिया रंग रंगा हुआ है
चुनरी अब भी धानी है।
भगत सिंह की फांसी चीखें।
आंखों में क्यों पानी है?
पूछ रहा है लकुटी वाला
कितनी दूर आजादी है।
जिस गुलशन को लहू से सींचा
दामन उसका क्यों खाली है?
आजाद बोस बिस्मिल जैसा
फिर खून रगों में भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
बारूदों की चीख बने।
जितने आंसू रोए हैं।
फुटपाथ पर नींद बने।
जितने सपने सोए हैं।
उन तक कोई लौ ना पहुंची
अब तक इन गलियारों से।
वह क्या जाने जाति धर्म?
जिनको सबने मिल लूटा है।
उनकी आंखों में है मंदिर
उनकी वाणी ही गीता है।
उन खुली और खाली आंखों में
स्वप्न नए भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
तुम एक कदम जो चलो साथ
हम मंजिल तक ले आएंगे।
तुम अर्पण स्वीकार करो
हम गंगाजल बन जाएंगे।
तुम रखो आकाश ये पूरा
हम इंद्रधनुष बन छाएंगे
साथ हमारे रंगोली में
रंग तुम्हें भी भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
भारत की बलिवेदी पर।
जिसने भी जान गवाई थी।
जिसके के आंगन में आजादी
दुल्हन बन कर आई थी।
तुम क्या कीमत अदा करोगे?
उनकी उस कुर्बानी का।
जिसने खुद ही सीने में
अपने अंगारे बोया था।
कतरा कतरा लहू गिरा था
आसमान भी रोया था।
सन 57 वाला वह पन्ना
फिर से हमको पढ़ना होगा।
आजादी के नए अर्थ
फिर से हमको गढ़ना होगा।
केसरिया रंग रंगा हुआ है
चुनरी अब भी धानी है।
भगत सिंह की फांसी चीखें।
आंखों में क्यों पानी है?
पूछ रहा है लकुटी वाला
कितनी दूर आजादी है।
जिस गुलशन को लहू से सींचा
दामन उसका क्यों खाली है?
आजाद बोस बिस्मिल जैसा
फिर खून रगों में भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
बारूदों की चीख बने।
जितने आंसू रोए हैं।
फुटपाथ पर नींद बने।
जितने सपने सोए हैं।
उन तक कोई लौ ना पहुंची
अब तक इन गलियारों से।
वह क्या जाने जाति धर्म?
जिनको सबने मिल लूटा है।
उनकी आंखों में है मंदिर
उनकी वाणी ही गीता है।
उन खुली और खाली आंखों में
स्वप्न नए भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।
तुम एक कदम जो चलो साथ
हम मंजिल तक ले आएंगे।
तुम अर्पण स्वीकार करो
हम गंगाजल बन जाएंगे।
तुम रखो आकाश ये पूरा
हम इंद्रधनुष बन छाएंगे
साथ हमारे रंगोली में
रंग तुम्हें भी भरना होगा।
आजादी के नए अर्थ
हमको फिर से गढ़ना होगा।





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