एक स्त्री
बहशी भीड़ की
हिंसा की भेंट चढ़ गई
उतार दिये गए उसके वस्त्र
उसे नोचा गया
मांस के लोथड़े की तरह
आखिर कौन थी यह स्त्री?
किस जाति से, किस समुदाय से?
उसका कोई परिचित चेहरा नहीं था भीड़ मे?
उसकी आँखों में था डर, दुःख
वह आधी आबादी का हिस्सा थी
जो छुप गई थी धान के खेत में
उसे बीच सड़क पर लाया गया था
यह सड़क कहाँ जाती थी?
किसी ने सुना होगा राजपथ पर चीत्कार
वहां एक आदमी भी था
जिसने पूरी घटना को रिकॉर्ड किया
यह आदमी कौन था?
सड़क पर हुई इस घटना का
कोई चश्मदीद गवाह नहीं
मै इन सबको नहीं जानती
जानना भी नहीं चाहती
मेरे जानने से फर्क भी नहीं पड़ता
मेरे कहने का भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा
मै इस भीड़ को जानती हूँ
भीड़ में कोई इंसान नहीं था
जिस तरह उसे नोंचा गया
ये कुत्तों की प्रजाति के भी नहीं थे
उसे टांग कर ले जाया गया
ये गिद्ध भी नहीं थे
इन्हें शेर भी नहीं कहा जा सकता
ये सब झुण्ड में थे
इसमें एक भी पुरुष नहीं था
ये सब आदम भेड़िये थे
जो हमारे समाज में इंसान की शक्ल में
छुपे रहते हैं
समय समय पर इनके दांत और नाख़ून
अचानक बड़े हो जाते है
और ये झुण्ड में शिकार करने
जंगल की ओर चले जाते हैं।
स्वरचित -गरिमा सिंह

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