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कविता

 वो एक दिन







वो दिन जीवन में
फिर दुबारा नहीं आया
उस एक दिन मैं हँसी बिना बात के
बिना किसी का मजाक उड़ाए
मै रोई चीख कर, किसी ने पागल नहीं समझा
उस दिन किसी ने कुछ नहीं पूछा
किसी की आँखे अजनबी नहीं थी
उस दिन सब कुछ सही जगह था
किसी ने
मेरा नाम भी नहीं पूछा

उस दिन तुमने मुझे कहा
दुनिया की सबसे सुन्दर स्त्री
और चूम लिया था
एक नीला फूल
तुम्हारी आँखे देह से पार
अनन्त मे टिक गई थी
तुम्हारे पदछाप पर मैंने रखा अपना पैर
जो एकदम मेरे पैर के माप का था
एक सूत भी इधर उधर नहीं

उस दिन सड़कें कम चिपटी थी
आदमी होश मे चल रहे थे
बच्चों के बसते
उनके माँ बाप के हाथ मे झूल रहे थे
बच्चे रास्ते के पत्थरों को
ठोकर मारते उछलते जा रहे थे
नहीं फटा था किसी का जूता
किसी गाड़ी ने किसी के ऊपर
कीचड भी नहीं उछाला
उस दिन सब कुछ अलग था
वो दिन कुछ खास था।

स्वरचित -गरिमा सिंह


2)

कुछ बदल गया
==========
अपने दायरे से झाँकना बाहर
निकलना खुद के घर से
घूमने अनदेखी गलियां
जिनके किनारो पर रहते है अनजान लोग
जिनके नाम नहीं जानते हम
जो हमें देखते है
जैसे दूर आकाश मे टंगा धूमकेतु

बाहर झांकना किसी खोल से 
अभी अभी कठोर धरती की छाती चीरकर
निकला हो अंकुर जैसे
अपने से अनजान
समेटे पूरे वजूद की सम्भावना
जिस पर टिक सकता है आकाश
जिसके एक छोर पर रुक सकती
आधी धरती
जो समेट सकता है पहाड़ की गहरी जड़े
ये जानते हुए भी कि
उस पर बहुत देर तक नहीं टिक सकते पाँव
लड़खड़ा जाना शामिल है
चलने मे, दौड़ने मे रुकने मे


सब नहीं बदले जाने पर भी हमेशा
दायरे टूटते है एक हद तक
लांघते है घेरे खुद के
और बढ़ाते है एक कदम
उस अनजान गली की तरफ

वहाँ  खडी  एक अनजान रात भी
बढ़ा रही है अपने कदम सुबह की ओर
तुम्हारे साथ बढ़ा रही है
आगे।
   Garima सिंह


(3)

 मुझे गिराने मे कई लोग
कई बार गिरे
गिरते रहे

उनके नीचे गिरने का हुनर
मुझे आकृष्ट करता रहा

एक दिन मैंने देखा
एक थाली मे बैगन की तरह
वो अब भी लुढ़क रहे है

बार बार गिरने पर
लुढ़कते हुआ आदमी
बिन पेदी का लोटा
बन जाता है
एकदम खाली

लेकिन फूला नहीं समाता
उसका लुढ़कना ही
जीवन का सार है
इसके लिए सारी हदें
पार करने को तैयार है।

स्वरचित -गरिमा सिंह 

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