सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लड़कियां -हिंदीभाषा में स्वरचित (कविता )

 कुछ कच्ची माटी सी 

अधसनी होती है
लड़कियां,
जिनसे बिनकर
निकाल दिया गया है
कंकर पत्थर,
कुछ रंगों के साथ
मिलाकर बनाया गया
मन चाहा आका र,
और डाल दिया जाता है
सूखने धूप में
जो सह लेती है हवा, बारिश,
धूल, धूप मिट्टी पानी,
और बहुत कुछ, जो
जरूरी भी नहीं सहना,

कुछ दीवारों की प्लास्टर
की तरह होती है लड़कियां,
धीरे धीरे खुरच कर पुराने
हुए प्लास्टर पर चढ़ाती है
ज्यों रंग रोगन,
उकेर देती है थोड़ी धरती
बना देती है पूरा आकाश,
और अपने लिए एक शून्य
जिसे भरने में बिता देती है जिन्दगी,

कुछ लड़कियां होती है
सड़कों पर लगी
कुछ होर्डिंग की तरह
जिसको कहीं भी
चिपकाये जाने की
आजादी है, और
खाली बची जगह पर
कुछ भी लिख दिए जाने की आजादी है,
बची जगहे किसी प्रचार के
काम आ जाती है,
लेकिन वो उकेर ही लेती है
थोड़ी जिन्दगी पूरा संसार
कुछ मिठास,
थोड़ी कड़वाहट, उदासी
और सजा लेती है खुद का
एक आशियाना।
कुछ लड़कियां हवा की
तरह होती है,
जो उड़ा ले जाती है
हवा, थोड़ी धूप,
ढेर सारी धूल,

कुछ पानी जैसी लड़कियां,
कल कल बहती,
किसी भी आकार में ढाल
दी जाती है,
सभी लड़कियां
जब तोड़ती है,
बांध किनारो को तोड़ कर
नदियों की तरह
बह जाती है,
सभी कुछ तोड़, जोड़
और मोड़ सकती है लड़कियां,।




स्त्री विमर्श पर वर्तमान समय में महिला लेखिकाओं ने बहुत अच्छा स्वानुभूति परक साहित्य रचा है। कविता हो या कहानी उपन्यास, संस्मरण सभी विधाओं में एक स्त्री की पीड़ा और उस पीड़ा से सृजित साहित्य सामने आया है, 
कुछ भी लिख देना, जिसमे मात्र स्त्री या लड़की शब्द आया है स्त्री विमर्श नहीं होता है, यह विषय अत्यंत गूढ है, और नितांत स्वानुभूति परक विषय है, जिसमे स्त्री का व्यक्तित्त्व अपनी पूर्णता में रूपायित होता है, 

स्त्री विमर्श पर आधारित एक स्वरचित कविता जो मैंने लिखा था कुछ दिन पहले, यहाँ आज पोस्ट कर रही हूँ, आशा है आप भावबोध तक पहुंच कर मेरी लेखनी कोसार्थक करें। 
--गरिमा सिंह 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...

सब ठीक है

  तुमसे मिली थी पहले भी कई बार और तुमने औपचारिकता वश कई बार पूछा था यूँ ही -सब ठीक? मैंने सिर हिलाया था कई बार हाँ में सब ठीक करने की सहमति में और मन नकार जाता था -सब कुछ ठीक कहाँ? कितनी बार दिन में चलती रही बिना ठहरे जिसे भटकना कह सकते है और रात मुँह फुलाए बैठी रही मेरी ओर पीठ किये जिसे शायद रूठना कह सकते है कितनी बार दरखतों से झाँक लेते है फटे हुए बादल और सारे सौन्दर्यबोध को झोंक देती हूँ सब कुछ ठीक होने के बहाने के बीच में न जाने कितनी बार एक चेहरा मेरे दुःख का हिस्सेदार रहा और वो मुझे ठीक से जानता भी नहीं था उससे मुझे कई बार शिकायते रहीं ये जानते हुए भी कि हर चेहरे पर नहीं लिखा जा सकता है भरोसा और हर आदमी नहीं जान सकता है सब ठीक है " बोले जाने का उतार चढाव वो नहीं माप सकता शब्द की गहराई को आज फिर मै तुमसे मिली कई बार की तरह तुमने पूछा -सब ठीक? कई बार की तरह मैंने भी सिर हिलाया सब कुछ ठीक है। और बहुत जोर से हँसी ठहाके के साथ भीतर कुछ खटाक से टूटा मेरे कानो ने भी नहीं सुनी कोई आवाज़ तुम्हारी तरह लेकिन दिन और रात को जरूर महसूस हुआ और नदी को भी अगल...

लिखते हुए प्रेम

  तुमने मुझसे कहा - तुम मुझे अच्छी लगती हो मैं तुमसे प्यार करता हूँ मै चुप रही एकदम चुप मरने के बाद जैसे कोई चुप हो जाता है तुमने कहा - जवाब दो, कुछ कहो मैंने कहा -तुम भी मुझे अच्छे लगते हो लेकिन मै तुमसे प्यार नहीं कर पाऊँगी मेरे दोस्त, क्योंकि मैंने जब भी तुम्हे याद किया मेरे माथे की बिंदी बहुत भारी लगने लगी, एक लाल रंग की रेखा ठीक भौहो के बीच लुढ़क गई कई बार तुम्हारा नाम कागज पर यूँ ही लिखते हुए चूड़ियों ने मात्राओं की दिशा को बदल दिया तुम्हारे घर की ओर जाने वाले रास्ते पर अक्सर बज उठती है पायल आंखे गढ़ती हैं पाप और पुण्य की परिभाषा तुम्हारे चेहरे को एक परिचित चेहरा ढक लेता है रोज जिसे मै पूरे जोर से धकेलती हूँ बचाती हूँ तुम्हारी दो आँखे जिसमें छुपाती हूँ अनकहा प्रेम मेरे दोस्त!मै तुम्हे नहीं बता सकती कैसे कई हिस्सों मे रोज बट जाता है मेरा प्रेम और तुम्हारे हिस्से का मै छुपा लेती हूँ अँधेरी खोह मे। --गरिमा सिंह