कुछ कच्ची माटी सी
अधसनी होती हैलड़कियां,
जिनसे बिनकर
निकाल दिया गया है
कंकर पत्थर,
कुछ रंगों के साथ
मिलाकर बनाया गया
मन चाहा आका र,
और डाल दिया जाता है
सूखने धूप में
जो सह लेती है हवा, बारिश,
धूल, धूप मिट्टी पानी,
और बहुत कुछ, जो
जरूरी भी नहीं सहना,
कुछ दीवारों की प्लास्टर
की तरह होती है लड़कियां,
धीरे धीरे खुरच कर पुराने
हुए प्लास्टर पर चढ़ाती है
ज्यों रंग रोगन,
उकेर देती है थोड़ी धरती
बना देती है पूरा आकाश,
और अपने लिए एक शून्य
जिसे भरने में बिता देती है जिन्दगी,
कुछ लड़कियां होती है
सड़कों पर लगी
कुछ होर्डिंग की तरह
जिसको कहीं भी
चिपकाये जाने की
आजादी है, और
खाली बची जगह पर
कुछ भी लिख दिए जाने की आजादी है,
बची जगहे किसी प्रचार के
काम आ जाती है,
लेकिन वो उकेर ही लेती है
थोड़ी जिन्दगी पूरा संसार
कुछ मिठास,
थोड़ी कड़वाहट, उदासी
और सजा लेती है खुद का
एक आशियाना।
कुछ लड़कियां हवा की
तरह होती है,
जो उड़ा ले जाती है
हवा, थोड़ी धूप,
ढेर सारी धूल,
कुछ पानी जैसी लड़कियां,
कल कल बहती,
किसी भी आकार में ढाल
दी जाती है,
सभी लड़कियां
जब तोड़ती है,
बांध किनारो को तोड़ कर
नदियों की तरह
बह जाती है,
सभी कुछ तोड़, जोड़
और मोड़ सकती है लड़कियां,।
कुछ भी लिख देना, जिसमे मात्र स्त्री या लड़की शब्द आया है स्त्री विमर्श नहीं होता है, यह विषय अत्यंत गूढ है, और नितांत स्वानुभूति परक विषय है, जिसमे स्त्री का व्यक्तित्त्व अपनी पूर्णता में रूपायित होता है,
स्त्री विमर्श पर आधारित एक स्वरचित कविता जो मैंने लिखा था कुछ दिन पहले, यहाँ आज पोस्ट कर रही हूँ, आशा है आप भावबोध तक पहुंच कर मेरी लेखनी कोसार्थक करें।
--गरिमा सिंह
🙏👌👌👌👌👌👌👌
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हटाएंAwesome Mam
जवाब देंहटाएं🙏अति सुंदर वर्णन 👏
जवाब देंहटाएंधन्यवाद 😊
हटाएंअति सुन्दर पंक्तियां 👌👌🙏
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