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जनवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुछ हिंदी गज़ले :जो प्रेम और सामाजिक भाव से उभरी है

 उठेगी लहरें बनकर फौलाद, तुमने समंदर नहीं देखा।  शायद तुम्हारे शहर ने तबाही का मंजर नहीं देखा। ये आतिशे कर देंगी राख तुम्हारा भी घर, इसमें छुपी है आग, तुमने अंदर नहीं देखा। रोज करके वादे, खुद ही मुकर जायेंगे, तुमने अभी समाज के पैगम्बर नहीं देखा। गर्दिश मे भी ज़ब लौट आया वो संभलकर, उसने तारों को भी फिर मुड़कर नहीं देखा। लड़ता रहा वो जंग खुद के ही जज़्बातों से, उसने अपनों के हाथ का खंजर नहीं देखा। अपनी ही जीती बाजी हार आया गैरों के लिए, तुमने उसके जैसा कभी सिकंदर नहीं देखा। (2) इंसान होकर इंसानियत से मुकर जाओगे? या आदमियत की शक्ल में सवंर जाओगे? बड़ी विषैली हो गयी है तुम्हारे शहर की हवाएं, क्या बिना सांस लिए ही तुम मर जाओगे? कब से दरवाजे पर लगी है बूढ़ी माँ की निगाहें, क्या उसकी नजरों से बचकर तुम शहर जाओगे? कहीं तो रुकेगा, तुम्हारी ख्वाहिशों का कारवां, या कब्रिस्तान से निकलकर फिर घर जाओगे? वो बच्चे जो खेलते है तुम्हारे गलियारों में, क्या उनके सपनों से भी अब मुकर जाओगे? अपनी ही लाश को कांधे पर रखकर फिरते हो हर रोज, अब किधर जाओगे? ...

साहित्यिक कवयित्री इंटरव्यू -चक्रव्यूह इंडिया द्वारा प्रकाशित :

आज चक्रव्यूह इंडिया के संस्थापक समीर शाही जी ने मेरा इंटरव्यू प्रकाशित किया। जिसके लिए मैं इनका धन्यवाद ज्ञापित करती हूं। साहित्य की यात्रा और मानव विकास की यात्रा दोनों लगभग एक जैसी होती हैं, जिस तरह से मनुष्य अपने जीवन में एक एक कदम पर तमाम संघर्षों के साथ अपनी जीवन यात्रा को पूरी करता है। साहित्य की भी यात्रा कुछ  ऐसे होती है।एक  साहित्यकार जो कहना चाहता है और अंत में वह जो कह पाता है उसके बीच कहीं ना कहीं एक अंतराल रह जाता है। इसी अंतराल को। इसी अंतराल को पाटने  के लिए वह के लिए वह लगातार साहित्य सृजन करता रहता है। विश्व के तमाम बड़े साहित्यकार और उनकी रचनाएं।इसी अंतराल  को भरने की जद्दोजहद से ऊपजी  है।  अक्सर साहित्य या कविता लिखने के दौरान मैंने यह महसूस किया है कि जो भाव एक कविता को लिखते समय होते हैं कहीं ना कहीं कविता जब तक अपने अंतिम रूप में पहुंचती है उन भावों में बहुत सारे बदलाव हो जाते हैं और जो मैं वास्तविक रूप से कहना चाहती हूं कहीं ना कहीं कविताउस  धरातल पर ना पहुंच करके कहीं और जाती है जिसके कारण से बार-बार मन अपनी उस भावना को व्यक्त क...

लड़कियां -हिंदीभाषा में स्वरचित (कविता )

 कुछ कच्ची माटी सी  अधसनी होती है लड़कियां, जिनसे बिनकर निकाल दिया गया है कंकर पत्थर, कुछ रंगों के साथ मिलाकर बनाया गया मन चाहा आका र, और डाल दिया जाता है सूखने धूप में जो सह लेती है हवा, बारिश, धूल, धूप मिट्टी पानी, और बहुत कुछ, जो जरूरी भी नहीं सहना, कुछ दीवारों की प्लास्टर की तरह होती है लड़कियां, धीरे धीरे खुरच कर पुराने हुए प्लास्टर पर चढ़ाती है ज्यों रंग रोगन, उकेर देती है थोड़ी धरती बना देती है पूरा आकाश, और अपने लिए एक शून्य जिसे भरने में बिता देती है जिन्दगी, कुछ लड़कियां होती है सड़कों पर लगी कुछ होर्डिंग की तरह जिसको कहीं भी चिपकाये जाने की आजादी है, और खाली बची जगह पर कुछ भी लिख दिए जाने की आजादी है, बची जगहे किसी प्रचार के काम आ जाती है, लेकिन वो उकेर ही लेती है थोड़ी जिन्दगी पूरा संसार कुछ मिठास, थोड़ी कड़वाहट, उदासी और सजा लेती है खुद का एक आशियाना। कुछ लड़कियां हवा की तरह होती है, जो उड़ा ले जाती है हवा, थोड़ी धूप, ढेर सारी धूल, कुछ पानी जैसी लड़कियां, कल कल बहती, किसी भी आकार में ढाल दी जाती है, सभी लड़कियां जब तोड़ती है,...

हिंदी कविता : स्वरचित और मौलिक (चाँद से पूछो )

चाँद से पूछो  --------------- कैसे रोज आवारा सा  निकल पड़ता है,  आकाश की गलियों के चक्कर लगाने -- फेरी वाले की तरह,  घर -घर जाकर बेचता हैचांदनी,  झोपडी से महल तक - खोजता है दुख दर्द,  माँ डाटती है ' करती है रोज  हज़ारो सवाल,  चाँद रोज निकलता है -पूछने  तुम्हारा दर्द, बहुत लोग देते  है उलाहने,  कभी भेजते है अपनी प्रेयसी  को सन्देश,  कोई देखता है किसी बिछड़े का प्रतिबिम्ब,  कोई मांगता है मन्नत,  चाँद सबकी सुनता है,  अपनी गठरी से एक तारा तुम्हारी  ओर फेंकता है,  मिल जाती है मुँह मांगी मुराद तुम्हे,  तुमसे बदले में  बिना कुछ लिए,  चुप चाप अपने हाथों से  सब कुछ बांध कर उठा लेता  है, जो तुमने दिया, ले जाकर माँ  के सामने पटक देता है,  माँ करती है गठरी खाली,  रात भर की कमाई को  दिन में अलग अलग,  रखता है, जिससे बूढ़ी दादी सूत   कात कर बना देती है, चदरिया,  और एक झोला,  जिसे लेकर वह फिर   रात में निकल जाता है,  खाली हाथ सबके दर...

हिंदी की कुछ गज़ले स्वरचित, भावपूर्ण

 कभी समय मिलेगा तो हिसाब कर लेंगे,  जिंदगी तुझसे भी दो दो हाथ कर लेंगे। एक एक पत्थर जोड़कर जो दीवार बनायी है, खुदा कसम इसे सीढ़ियों में शुमार कर लेंगे। समंदर की लहरों से डूबकर पार होना है, हम इस तिनके को ही पतवार कर लेंगे। नहीं डरते जिंदगी की किसी रुसवाई से, वक्त पर मौत से भी दीदार कर लेंगे।  दी है थोड़ी चादर जो सिर ढकने को उसे ही हम एक दिन आसमान कर लेंगे।  (2) ये लम्हा रेत सा उड़ा दूँ क्या, जज्बातों को फिर हवा दूँ क्या,? पैर के छाले दुखने लगे हैअब, कोई मरहम लगा लूँ क्या,? पड़ गई है मन मे दरारें बहुत, आसुंओ से भीगा लूँ क्या? दिल किसी जगह नहीं लगता, तेरे नाम से फिर बहला लूँ क्या? कोई शै तेरे जैसी नहीं लगती, कोई दिया ही जला लूँ क्या? सांस घुटती है मुहब्बत नाम से, दिल मे इसे दफना लूँ क्या? चलते हुए इस पतझड़ मे ठहर कर, दामन मे एक फूल छुपा लूँ क्या? (3) चाँद से नूर ज़ब चुराया होगा। तब कहीं हुस्न बनाया होगा। उड़े होंगे कुछ रंग हवाओं मे, जुल्फ को ज़ब लहराया होगा। चमक उठे होंगे जुगुनू हवा मे, पलकों को ज़ब उठाया होगा। कायनात की सारी क...