उठेगी लहरें बनकर फौलाद, तुमने समंदर नहीं देखा। शायद तुम्हारे शहर ने तबाही का मंजर नहीं देखा। ये आतिशे कर देंगी राख तुम्हारा भी घर, इसमें छुपी है आग, तुमने अंदर नहीं देखा। रोज करके वादे, खुद ही मुकर जायेंगे, तुमने अभी समाज के पैगम्बर नहीं देखा। गर्दिश मे भी ज़ब लौट आया वो संभलकर, उसने तारों को भी फिर मुड़कर नहीं देखा। लड़ता रहा वो जंग खुद के ही जज़्बातों से, उसने अपनों के हाथ का खंजर नहीं देखा। अपनी ही जीती बाजी हार आया गैरों के लिए, तुमने उसके जैसा कभी सिकंदर नहीं देखा। (2) इंसान होकर इंसानियत से मुकर जाओगे? या आदमियत की शक्ल में सवंर जाओगे? बड़ी विषैली हो गयी है तुम्हारे शहर की हवाएं, क्या बिना सांस लिए ही तुम मर जाओगे? कब से दरवाजे पर लगी है बूढ़ी माँ की निगाहें, क्या उसकी नजरों से बचकर तुम शहर जाओगे? कहीं तो रुकेगा, तुम्हारी ख्वाहिशों का कारवां, या कब्रिस्तान से निकलकर फिर घर जाओगे? वो बच्चे जो खेलते है तुम्हारे गलियारों में, क्या उनके सपनों से भी अब मुकर जाओगे? अपनी ही लाश को कांधे पर रखकर फिरते हो हर रोज, अब किधर जाओगे? ...
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