आज चक्रव्यूह इंडिया के संस्थापक समीर शाही जी ने मेरा इंटरव्यू प्रकाशित किया। जिसके लिए मैं इनका धन्यवाद ज्ञापित करती हूं। साहित्य की यात्रा और मानव विकास की यात्रा दोनों लगभग एक जैसी होती हैं, जिस तरह से मनुष्य अपने जीवन में एक एक कदम पर तमाम संघर्षों के साथ अपनी जीवन यात्रा को पूरी करता है। साहित्य की भी यात्रा कुछ ऐसे होती है।एक साहित्यकार जो कहना चाहता है और अंत में वह जो कह पाता है उसके बीच कहीं ना कहीं एक अंतराल रह जाता है। इसी अंतराल को। इसी अंतराल को पाटने के लिए वह के लिए वह लगातार साहित्य सृजन करता रहता है। विश्व के तमाम बड़े साहित्यकार और उनकी रचनाएं।इसी अंतराल को भरने की जद्दोजहद से ऊपजी है।
अक्सर साहित्य या कविता लिखने के दौरान मैंने यह महसूस किया है कि जो भाव एक कविता को लिखते समय होते हैं कहीं ना कहीं कविता जब तक अपने अंतिम रूप में पहुंचती है उन भावों में बहुत सारे बदलाव हो जाते हैं और जो मैं वास्तविक रूप से कहना चाहती हूं कहीं ना कहीं कविताउस धरातल पर ना पहुंच करके कहीं और जाती है जिसके कारण से बार-बार मन अपनी उस भावना को व्यक्त करने के लिए बेचैन हो उठता है, कभी-कभी एक कविता को लिखने के क्रम में कई कविता बन जाती है, फिर भी प्रत्येक कविता के भाव भूमि और उसका धरातल एक दूसरे से भिन्न होता है। मन का उद्देग विचार जब कविता के रूप में परिणत हो जाते हैं तो मन को बहुत सुकून मिलता है और बहुत सारी कविताएं लिखने के पश्चात मुझे अरस्तु का "विरेचन सिद्धांत" कहीं ना कहीं उपयुक्त प्रतीत होता है कि साहित्यकार अपनी भावनाओं को कविता या अन्य माध्यम से व्यक्त करके तमाम भावनाओं से मुक्त हो जाता है।
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