सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिंदी की कुछ गज़ले स्वरचित, भावपूर्ण

 कभी समय मिलेगा तो हिसाब कर लेंगे, 

जिंदगी तुझसे भी दो दो हाथ कर लेंगे।

एक एक पत्थर जोड़कर जो दीवार बनायी है,
खुदा कसम इसे सीढ़ियों में शुमार कर लेंगे।

समंदर की लहरों से डूबकर पार होना है,
हम इस तिनके को ही पतवार कर लेंगे।

नहीं डरते जिंदगी की किसी रुसवाई से,
वक्त पर मौत से भी दीदार कर लेंगे। 



दी है थोड़ी चादर जो सिर ढकने को
उसे ही हम एक दिन आसमान कर लेंगे। 
(2)

ये लम्हा रेत सा उड़ा दूँ क्या,
जज्बातों को फिर हवा दूँ क्या,?

पैर के छाले दुखने लगे हैअब,
कोई मरहम लगा लूँ क्या,?

पड़ गई है मन मे दरारें बहुत,
आसुंओ से भीगा लूँ क्या?

दिल किसी जगह नहीं लगता,
तेरे नाम से फिर बहला लूँ क्या?

कोई शै तेरे जैसी नहीं लगती,
कोई दिया ही जला लूँ क्या?

सांस घुटती है मुहब्बत नाम से,
दिल मे इसे दफना लूँ क्या?

चलते हुए इस पतझड़ मे ठहर कर,
दामन मे एक फूल छुपा लूँ क्या?

(3)

चाँद से नूर ज़ब चुराया होगा।
तब कहीं हुस्न बनाया होगा।

उड़े होंगे कुछ रंग हवाओं मे,
जुल्फ को ज़ब लहराया होगा।

चमक उठे होंगे जुगुनू हवा मे,
पलकों को ज़ब उठाया होगा।

कायनात की सारी कशिश से,
उसका रूप फिर सजाया होगा।

ज्यादा क्या कहूं उसके प्यार मे,
पूरा सागर ही समाया होगा।

उतर आये होंगे फ़रिश्ते धरती पर,
ज़ब उसने प्यार से बुलाया होगा।

हुई होगी उसकी हर दुआ कबूल,
हाथ ज़ब भी उसने उठाया होगा।

(4)

दिल की दहलीज पर कोई आता रहा,
मुझे चाँद कहकर फिर बुलाता रहा।

रातों को इसकी भनक तक न लगी,
एक चेहरा भी उसमे जगमगाता रहा।

नींद टूटी नहीं कल की बैचैनी से,
ख्वाब कोई मुझे जो सुलाता रहा।

सूना पनघट था जैसे गुलजार सा,
दिल की दरिया मे कोई नहाता रहा।

माँ के सीने से लग कर कोई सो गया,
ख्वाब पलकों मे ऐसे छुपाता रहा।

तुम जो बिछड़े अब तक आये नहीं,
तेरे जैसा कोई आता जाता रहा।

टूटकर जो कभी बिखर था गया,
वही ख़्वाबों के टुकड़े उठाता रहा।

(5)

इश्क था तो मुझे फिर बुला लेते।
कसूर था ग़र, मुझे सजा देते।

कहते थे मुझे नमक इश्क का,
खुद मे ही मुझे फिर घुला देते।

बिखरे से जज्बातों को समेटकर,
चाहते तो एक बार मुस्कुरा देते।

प्यार एहसास है जिन्दगी भर का,
सारे गिले शिकवे तुम भुला देते।

मौत तो आनी है सबको एक दिन,
मौत से जिन्दगी को मिला देते।

मुहब्बत किसी की बनने से पहले,
जहर देकर मुझे तुम सुला देते।

--Garima singh

टिप्पणियाँ

  1. आपकी सारी नज़्मे बहुत ही खूबसूरत हैं ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छा लिखा है मैडम आपने।।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

एक प्रेममय स्वरचित गीत :जो मन को प्रेमभाव से भर देगा

 तुम बिन कैसे गीत सुनाऊं  मन को फिर कैसे समझाऊं। गीत तुम्हारे राग तुम्हारे जीवन के सब स्वांग तुम्हारे तुम से रोना तुम से हसना तुम बिन जीवन कितना सूना कैसे तुम बिन साज सजाऊं मन को फिर कैसे समझांऊ। सपनो के हर बिम्ब मे तुम हो जीवन के हर लय मे तुम हो साँसो की ये डोर तुम्ही से तुम बिन जीवन पल -पल रीता कैसे तुम बिन फिर मुस्काउ मन कैसे फिर समझाऊ। मन के सारे गीत गुजर गए जीवन के सब मीत मुकर गए जीवन की हर छोटी बाते छंदो जैसे हमको कर गए दरिया का पानी भी साथी धीरे -धीरे यूं उतर गए कैसे तुम बिन फिर मुस्काउं मन को फिर कैसे समझाऊ। भूली बिसरी सारी यादें जीवन को बहला जाती है मन सलिला को तेरी यादें पत्थर सा लहरा जाती है। विचलित मन चंचल सा जीवन झंझा भरी कहानी लेकर जीवन पथ पर कैसे जाऊं मन को फिर कैसे समझाऊं। गरिमा सिंह (2)    (एक कविता जिसके माध्यम से अपने अन्तः मन की गहरी यात्रा का संकेत है, मनुष्य पूरे संसार को जानने और अपने अधीन करने को लालायित होता है, बाहर की सभी चीजों को जानता और समझता है लेकिन खुद से खुद की दूरी तय करना एक कठिन कार्य बन जाता...

गीत

 रात को दिन, दिन को पहर कर दिया एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ खुल गए तेरे गेसू जो अंदाज से आसमानो पे बदली यूँ छाने लगी, खुल गई होंठ की पंखुड़ी जो तेरे कुछ कलियाँ यूँ ही मुस्कुराने लगी, ---- आज पतझड़ को तुमने चमन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---- चाँद उतरा मेरे आईने में फखत रौशनी गीत यूँ गुनगुनाने लगी, जुगनुओं ने की ऐसी कारीगरी रात आँचल को जैसे सजाने लगी, -------- धरा को ही तुमने, गगन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ वक़्त ठहरा रहा पांव चलते रहे रास्तों में मुझे बेबसी सी लगी, तुझको ढूँढा हर इक चेहरे में यूँ हर आगोश में बस कमी सी लगी, ----= फेरकर यूँ निगाहें करम कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---Garima singh 

दबे पाँव आता है बहुत कुछ

  प्रेम लिखते हुए काँपती है अंगुलियाँ  आँखे बनाती है चित्र कहीं दूर तुम्हारे पास होकर भी कविता में लिखती रही विरह मेरे भीतर बैठी रही शाश्वत विरहिनी जिसे छज्जे से निहारना है दूर से आते प्रेमी को जिसे केशो में गूथ लेना है धरती पर गिरे सारे फूलों को जिसे अभिसारिका बनने से बचना है बचाना है प्रेम मेरे लिखने की पहली शर्त प्यार नहीं था तुम्हारा होना था प्यार मे तुम्हे खिलना था पहली धूप की तरह तुम्हे होना था सूरजमुखी मुँह किये विपरीत दिशा में जागना था अंतिम कल्प तक यह कोई शर्त नहीं थी बस मनुहार था एक धागा था जिसे मेरी आत्मा में मोती पिरोना था जब भी प्रेम में किसी शर्त को लाया गया वो पहली कभी नहीं रही उसके होने में प्यार था तुम्हारे होने में दुःख मैंने लिखने मे दुःख को चुना करने में प्यार को एक बात समझ नहीं आई मेरे प्रेम करने के साथ ख़ुशी आनी चाहिए थी मन में अफ़सोस दुःख  ने सेंध लगा लिया तुम्हारे ख़ुशी के बहाने मै रचती हूँ सुख के साथ अनगिनत दुःख जिसका तुम्हारी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं मेरे सुख से भी कोई सरोकार नहीं प्रेम के बहाने कई चीजें चली आती है...