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चश्मा

  चश्मा ====== बचपन में अक्सर लगा लेती थी पिता का चश्मा किसी रिश्तेदार का भी जो घर की मेज पर उतार कर रख देते थे अपिरिचत आदमी का चश्मा भी मुझे बहुत भाता था पिता डांटते थे रखना चाहते थे चश्मे से दूर कभी शहर के मेले से कभी गाँव के मेले से खरीदे रंग -बिरंगे चश्मे इसकी एक खूबी थी जिस रंग का चश्मा उसी रंग का दृश्य धीरे धीरे चश्मे की आदत हो गई बिना चश्मे के सब कुछ दिखता था बेरंग मेरे पास कई चश्मे है घर का चश्मा बाजार का चश्मा ऑफिस का चश्मा इन दिनों मै चश्माघर में रहती हूँ आज मै सपने में भी खोज रही थी अपना चश्मा जो पड़ोस की छोटी बच्ची चुरा ले गई थी मै उससे छीन लेना चाहती हूँ चश्मा और चीख कर कहना चाहती हूँ पिता की तरह "चश्मे से तुम सबकी आँखे खराब हो जाएंगी ¡" स्वरचित -गरिमा सिंह 

शिकार

 एक स्त्री बहशी भीड़ की हिंसा की भेंट चढ़ गई उतार दिये गए उसके वस्त्र उसे नोचा गया मांस के लोथड़े की तरह  आखिर कौन थी यह स्त्री? किस जाति से, किस समुदाय से? उसका कोई परिचित चेहरा नहीं था भीड़ मे? उसकी आँखों में था डर, दुःख वह आधी आबादी का हिस्सा थी जो छुप गई थी धान के खेत में उसे बीच सड़क पर लाया गया था  यह सड़क कहाँ जाती थी? किसी ने सुना होगा राजपथ पर चीत्कार वहां एक आदमी भी था जिसने पूरी घटना को रिकॉर्ड किया यह  आदमी कौन था? सड़क पर हुई इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं  मै इन सबको नहीं जानती जानना भी नहीं चाहती मेरे जानने से फर्क भी नहीं पड़ता मेरे कहने का भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा  मै इस भीड़ को जानती हूँ भीड़ में कोई इंसान नहीं था  जिस तरह उसे नोंचा गया ये कुत्तों की प्रजाति के भी नहीं थे उसे टांग कर ले जाया गया ये गिद्ध भी नहीं थे इन्हें शेर भी नहीं कहा जा सकता ये सब झुण्ड में थे  इसमें एक भी पुरुष नहीं था ये सब आदम भेड़िये थे जो हमारे समाज में इंसान की शक्ल में छुपे रहते हैं समय समय पर इनके दांत और नाख़ून अचानक बड़े हो जाते है और ये झुण्ड में शिकार करने जंग...

गीत

 रात को दिन, दिन को पहर कर दिया एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ खुल गए तेरे गेसू जो अंदाज से आसमानो पे बदली यूँ छाने लगी, खुल गई होंठ की पंखुड़ी जो तेरे कुछ कलियाँ यूँ ही मुस्कुराने लगी, ---- आज पतझड़ को तुमने चमन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---- चाँद उतरा मेरे आईने में फखत रौशनी गीत यूँ गुनगुनाने लगी, जुगनुओं ने की ऐसी कारीगरी रात आँचल को जैसे सजाने लगी, -------- धरा को ही तुमने, गगन कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ------ वक़्त ठहरा रहा पांव चलते रहे रास्तों में मुझे बेबसी सी लगी, तुझको ढूँढा हर इक चेहरे में यूँ हर आगोश में बस कमी सी लगी, ----= फेरकर यूँ निगाहें करम कर दिया, एक तेरे प्यार ने क्या से क्या कर दिया। ---Garima singh 

सपने

 सपनें ========= सपने जिंदगी तो नहीं, लेकिन जिंदगी के लिए जरूरी से है सपने। कभी नींद में भागते है अधूरी ख्वाहिश को लेकर, कभी नींद से जगाते है सपने। कभी पलकों पर झिलमिलाते है अनकही बातों की तरह, जब हो उदासी जीवन मे नई राह दिखाते है सपने। तुम उदास हो तो उदास होते है, तुम्हारे साथ नाचते गाते है सपने। तुम्हारे मन को खाली कर अपना ही बोझ उठाते है सपने। कभी' कबीर 'की बानी बनकर मन को झकझोर जाते है, कभी मीरा के प्रेम जैसे सताते है सपने। कभी गुजर जाते है मन की गलियों से चुपचाप, कभी समंदर की लहरों सा डराते है सपने। मुझे खींच लाते है बनकर इबादत तुम्हे भी खुदा सा बनाते है सपने। Garima singh ------

सुबह

  रोज सुबह ====== सुबह सुबह बिस्तर पर पार्क मे सड़कों पर चाय की दुकानों पर ऑफिस की कुर्सी पर अकेले कमरे मे बिखरा है जो आदमी वही दोपहर तक निढाल होकर लगा लेता है टेक शाम को खुद को समेटकर सड़को की रोशनी  मे बचकर निकलता है घर मे टी वी के चैनल बार बार बदलता है तौलिए को सोफे पर पटकता है बाथरूम का दरवाज़ा धड़ाम से बंद करता है बेवजह होता है नाराज आईने के सामने खड़ा होकर खुद को निहारता है जल्दी से कुर्ते की बटन बंद कर बाहर भागता है रात को नींद की गोली खाकर सोता है आदमी अपने भीतर न जाने क्या क्या खोता है। =Garima singh 

नहीं गढ़ा जा सकता

  तुम्हारे साथ प्रेम के वो दिन मैंने देखा की एक चिड़िया की तरह फुर्र हो गया दूर टंगा आसमान में एक तारा मुझे देखता रहा तुम्हारी खाली आँखों में उस चिड़िया की परछाई उभर आई कई बार तुम्हारे साथ महसूस किया कि दुनिया में प्रेम करने की बहुत सी जगहे है जहाँ प्रेम उगता है घास की तरह तुमसे दूर होकर जाना प्रेम करने की बहुत कम जगहे बची है मखमली घास पर जगह जगह गिरे है चिड़िया के नाजुक पंख मुझे लगता है अब प्रेम मेरे लिए आसमान में टांगे गए अकेले तारे की तरह है जिसकी टिमटिमाती रोशनी में आँखे खोजती है तुम्हारा प्रेम सच है प्रेम के हर रूप में भाषा आड़े आ ही जाती है शब्द अक्सर दे जाते है धोखा मात्राएँ नहीं उठा पाती है भार मौन भी करता है अभिव्यक्ति बनता है प्रेम की शक्ति जीवन के सारे ताप इसमें उतर आते है चुपचाप चला आता है सारा अंधेरा याद की तरह हर आँखों ने पढ़ी अपनी भाषा हाथो ने उठाये ग्रंथ और सबने मिलकर हारकर एक दिन एलान कर दिया - नहीं गढ़ा जा सकता है प्रेम का निर्धारित व्याकरण। --गरिमा सिंह

मेरी पुस्तक विमोचन की कुछ झलकियां 🌹