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नवंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कृति बहुमत मे कविता

 

शहर दर शहर

  कितने शहर जागते है मेरे भीतर एक साथ मन के विस्तर पर चुपचाप बदलते है करवट यादों का एक पुलिंदा रखे सिरहाने मुझे भी दिखाते है कई दृश्य कई शहरो मे भटकते हुए टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर बैठ जाती हूँ उनकी गलियाँ तंग है बहुत सिसकियाँ लेते हुए जार जार एक बच्चे की तरह कितने शहर लिपट गए है मेरी आत्मा से और ताकतें है मेरी आँखों मे जैसे देख लिया हो कोई मनपसंद खिलौना पोंछते हुए आंसू मासूम सी हँसी बिखर जाती है वो शहर  जहाँ मैने देखा था पहली बार जीवन को पलते हुए बहुत नजदीक से ढलते हुए  एक शाम और जाना था सब कुछ ढलता है शहर कोई भी हो सबके पास अपनी शाम होती है अपने तरह की एक सुबह भी सब कुछ था खुशनुमा एक चाँद की तरह वह शहर मुझे पहचानता था मुझसे ज्यादा सारे फूल मेरे दोस्त थे कोयल के साथ कूकते हुए घंटो हॅसते थे अनायास वो शहर जहाँ घर से ज्यादा किताबें पसंद थी बस्ते मे पूरा शहर समा जाता था किसी उपन्यास से निकलकर नायक धीरे से पकड़ता था हाथ ले जाता था कल्पना लोक मे चेहरे की लालिमा अचानक बढ़ जाती थी तितलियाँ आ जाती थी थोड़ा पास कई शहर बदले मेरे भीतर कई चेहरे इन शहरों मे खो...

सब लिख रहे है

  जब सब लिख रहे थे हथियार लिख रहे थे युद्ध बोना चाहते थे दंगाई सीने मे बन्दूके पत्थर बाजी  सीख रहे थे हाथों मे पकड़े हुए कलम मैंने लिखा फूल लिखा युद्ध का अधूरा अंत बचाना सीखा अपना सिर हाथों मे पकड़े हुए कलम मैं भी लिखना चाहती थी एक फूल एक तितली एक बगीचा जब सब लिख रहे थे पीला पत्ता जब सब महसूस कर रहे थे आग जो फैली है चारों तरफ सोख रही है पानी उठ रहा है धुआँ मैंने अंगुली से पानी पर बना दिया जंगल जंगल से गायब है जानवर गायब है पहाड़ नदी जंगल से गायब है पेड़ भी जब सब दौड़े जा रहे थे भूख कहते हुए उस आखिरी छोर की ओर जहाँ फ़सल खेतों मे जल रही है जहाँ छूटे सांडो ने रौंद दिया है पूरा खेत बची खुची कुछ फसले लाद दी गई है शहर की ओर जाने वाली गाड़ी पर मै ख़डी थी कागज को हाथ मे लिए जहाज बनाकर हवा मे उडाने के लिए जब कुछ लोग शांत है एकदम चुप, बुत की तरह मै तोडना चाहती हूँ चुप्पी दागे गए गोले की तरह उड़ा देना चाहती हूँ  कविता अपनी जिसमें मैंने हथियार की जगह गलती से समझौता लिखा था। गरिमा सिंह 

मछलियां

  मैंने सुना था कभी  जैसे सुनी जाती है आती हुई ट्रेन की सीटी या सुनाया गया उलाहने की तरह कभी "एक मछली करती है पूरा तालाब गन्दा" मैंने केवल सुना था जाना नहीं अब जाना एक मछलीसे गढ़े जा सकते है प्रेम प्रतिमान बदले जा सकते है चेहरे पानी के बिना एक मछली फिसल सकती है तुम्हारी आत्मा के सहारे एकांत मे एक मछली ढ़ो सकती है तुम्हारे देवता को बचा सकती है इंसान होने से समूची पृथ्वी के साथ एक मछली डूब सकती है बिना आक्सीजन के बढ़ा सकती है पानी मे आक्सीजन की मांग एक मछली बचा सकती है प्रलय के समय तुम्हे पूरी पृथ्वी समेत ये एक मछली निश्चित ही बची रहनी चाहिए तालाब मे मै खोज रही हूँ इसे आस पास के तालाब मे सारी मछलिया  तैर गई है जल मे दूर तक फैल रही है संडाध सारे तालाब दिख रहे गंदे आखिर कहा होगी वो एक मछली इन मरी हुई मछलीयों के बीच ¡ गरिमा सिंह 

एक टुकड़ा दुःख

  मेरे पास एक टुकड़ा दुःख था बादल की तरह मन मे तिर रहा था थी एक मुट्ठी भर धूप जिसे मैंने छुपाये रखा मेरे पास एक टोकरी भरे चेहरे थे सूखे से मरियल कुम्हालाये हुए जिसे कमर दाहिने टेक लगाए हुए मै निकल जाती हूँ किसी नायिका की तरह जिसके पास खोने को बस धूप है साथ चलने को एक टुकड़ा बादल मेरे साथ कालिदास की शकुंतला भी प्रथम स्पर्श से अभिभूत चलती है दुष्यंत की याद मे खोई खोई अनमनी सी वह श्रापित भी होकर अनजान रही उसे नहीं याद है कोई धूप न कोई बादल का टुकड़ा नहीं जमीन पर उगी घास जो चल रहे है उसके साथ उसके भीतर एक दरिया है बहता हुआ छलकता हुआ उसी मे जलेगी आग चुपके से वो भी धीरे धीरे चुनेगी चलते हुए धरती के दुःख रखेगी एक टोकरी मे उठाएगी सिर पर आखिर वह भी है प्रेम मे डूबी स्त्री उसके पास भी होगा उसके हिस्से का बादल का टुकड़ा और एक मुट्ठी धूप अंत मे। स्वरचित -गरिमा सिंह