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देश का रोना /

  देश का रोना एक बिल्ली के रोने से उभर आईं हैं टेढ़ी -मेढ़ी लकीरें मुहल्ले भर की औरतों के माथे पर होंठ बुदबुदा रहें प्रार्थना के कमजोर शब्द आँखे टिकी है किसी साकार पर वो बचना चाहती हैं अपशकुन से जो पैदा होती है बिल्ली के रोने मात्र से वह नहीं रो सकती भूख से? किसी वेदना से? चिड़ियाँ मडराती है किसी पेड़ के पास चीं चीं के शोर से भर जाता है आसमान कुछ स्त्रियां रोती हैं झुण्ड में दुःख अलग होने पर भी उनकी संवेदना नहीं समाती भाषा में अकेले पार्क में बैठा बूढा आदमी कुर्ते की बांह से पोछता है आंसू देखते हुए दूर छोटा बच्चा वो रोज रख लेता है सिर पर हाथ पढ़ते हुए सुबह का अख़बार टहलता है सुनते हुए कोई पुराना गाना भरते हुए लम्बी सांस पिता बगीचे में ताकते हैं कनेर के सबसे ऊपरी शाख पर खिला फूल माँ रोती है सर्दी के बहाने से कवि अपनी कविता में उगा रहा झरबेरी के पेड़ जिससे उलझते हैं उसके कपड़े चलाते हुए विचारों की कैंची निर्धारित करता है हँसने -रोने का समीकरण विषुवतीय वनों में सुलग रही है आग ध्रुवों पर बर्फ धीरे -धीरे पिघल रही है भूगोलवेत्ताओं के माथे पर उभर रही है नसें ओजोन प...
  सबसे जरूरी बात ============ तुमसे मिलने के बाद कई बार लगा कि- जरूरी नहीं है  तुम्हारा हाथ पकड़ कर ये बीच की सड़क पार करना जो आ गई है मेरे और तुम्हारे बीच या हम खड़े कर दिए गए हैं इसके दो समानांतर किनारों पर बस जरूरी है  गुजरते हुए तुम्हे देखना पीछे मुड़कर एक स्मित के साथ और कानो की बाली का अचानक मुड़ जाना तुम्हारी ओर कैद करने को तस्वीर तुम कहते थे -हसरत से देखी गई चीजें कभी दूर नहीं जाती हैं कई बार काम की बातों में कुछ भी काम का नहीं होता था बस सुनना था तुम्हे अपने भीतर उतारने के लिए बहुत गहरे तुम्हारे पीठ पर अंगुलियों से बना रही थी अपने नाम का पहला अक्षर जो अंकित हो जाये मन की स्क्रीन पर फोन रखते हुए अंगुलियों में उतर आते थे प्राण गूंजते थे कानों में शब्द अनसुने संगीत की तरह मन दुहराता था एक बच्चे की तरह वर्ण माला के सीखे  गए नए अक्षरों को जो बोल देता है शब्द कोश के बाहर के शब्द जिसके अर्थ बने ही नहीं अब तक काम की कई बातों में बहुत कुछ तुम्हारे काम का नहीं था फिर भी तुम ले आये मखमली सी एक शाम अपनी खूबसूरत आँखों की तरह जहाँ नदी थी,-- रे...

इन्तजार /उम्मीदे

  इंतजार करूंगी मैं तुम्हारा पतझड़ में पेड़ की तरह तुम बसंत की तरह एक दिन लौटोगे और मैं लद जाऊंगी नई कोपलों से इंतजार करूंगी मै तुम्हारा सूख गई नदी की तरह जिसकी फटी दरारों पर  पहली बूँद से चमक उठोगे तुम और धीरे-धीरे वापस लौट आएंगी मछलियां तुम्हारे इंतजार में मुझे पेड़ हो जाना है जिस पर लौट आएंगी शाम तक सभी यादें चहचहाती चिड़ियों की तरह और कट जाएगी इंतजार की काली रात मैं समुद्र की तरह अमावस और पूर्णिमा को बेचैन हो जाऊंगी पाने को अपने हिस्से का चांद और फिर समेट लूंगी  सारी लहरों को अपने ही भीतर तुम्हारा इंतजार करते हुए मैं समय का इंतजार करूंगी तुम्हारा आना भी तय है बसंत की तरह बारिश की तरह मेरे सामने अब लंबा इंतजार है जिसे मैं  तय करूंगी तुम्हारे कपड़े पर छूट गई उस महक से जो हवा के साथ मेरे पास आती है और तुम जानते हो हवाओं का कोई तय समय नहीं है मै तुम्हारी खूशबू के गिरफ्त में हूँ और इंतजार के सभी अक्षर प्रेम में मेरे सामने पहाड़ से खडे हो गए हैं। (-------) (2) मै रोज एक उम्मीद उछालती हूँ जैसे कोई बच्चा फेकता है पत्थर खाली आकाश की ओर ...