सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मार्च, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छल

  दृश्य में भीड़ है भीड़ में एक चेहरा है उस पर टिकी है हजारों नजरें उम्मीद से भरी हुई विस्मय से खींची हुई बढ़ रही है नजरें उसके चारों ओर भीड़ में अकेले चेहरे को कोई फर्क नहीं पड़ता इस सवालों भरी नजरों से वो जानता है सारे सवाल उन सवालों का आधा इतिहास उसी ने पैदा किये है सवाल और भीड़ उलझ गई है खोजने में उसके उत्तर कई बार ऐसे ही भीड़ ने कई बार उठाये सवाल,पहले भी वो भीड़ किसी खाई में समा गई अपने अनसुलझे सवालों की फेहरिस्त के साथ  

देखना स्त्री को

  देखना स्त्री को उतर कर कभीअपने ऊँचे मकान से निकल कर बाहर चौखट के बिना खटकाये साँकल जब खुले हो मन के दरवाजे और आँखों मे बहती हो कोई अदृश्य नदी या झरना देखना उसे थोड़ा सा आँखों को मीचकर बहुत पास से क्यूंकि स्पष्ट दिखने के लिए जरूरी है बराबरी पर बनना प्रतिबिम्ब उसे छूना जब उतर जाये तुम्हारे भीतर प्राण और अंगुलियों के पोरो पर नहीं चटकती हो चिंगारी जब चुक जाये तुम्हारे अनर्गल शब्द तुम एक स्त्री को पाना साँसो की तरह जो मौजूद है साथ तब भी जब तुम सोते हो गहरी नींद मे तब भी जब स्थिर हो जब भाग रहे हो बहुत तेजी से बचाने को अपना स्व तब भी जब तुम्हे नहीं महसूस होती अपने भीतर कोई उत्तेजना वो रहती है हमेशा बिना कोई जगह घेरे भीतर शांत,अडोल, मध्यम सुषमना नाड़ी की तरह उसे चाहो जैसे बुद्ध ने चाहा था ज्ञान को और किया था महाभिनशक्रमण राज पाट और अधिकार से ही नहीं अपने होने के झूठे दम्भ से अपने  निर्मित पुरुषतत्त्व से और चखा था एक बहिस्कृत स्त्री के भोजन का स्वाद गुजरे थे खुद के अंदर होने को एकात्म और जाना था स्त्री नहीं एक पुरुष के भीतर स्त्री का आभाव हमें बनाता है...