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दिसंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मै नदी हूँ

मै नदी हूँ गुजर जाउंगी तुम्हारे भीतर चुपचाप नक्शे पर छोड़े बिना कोई निशान बिखरूंगी नहीं तुम्हारी आँखों में क्षणिक सौंदर्य बनकर किसी झरने की तरह नहीं घिसना मुझे कोई पत्थर न कोई शिवलिंग ही बनाऊंगी जिसके सहारे तुम फिसलते रहे मेरी आत्मा के किसी छोर पर और मै ढोती रही अपने सिर पर तुम्हारे किये का भार मै  किसी गंगा की तरह नहीं धोऊंगी तुम्हारे पाप तुम्हारे पुरखो को तारने मै नहीं उतरूंगी धरती पर किसी भागीरथ की तपस्या के जाल मे फंसकर नहीं बधूँगी शिव की जटाओ में कभी मै बदलते हुए रास्ते गुजर नहीं जाउंगी डुबाकर तुम्हारे सीमान्त मै किसी समुद्र मे जाकर भी नहीं मिलूंगी न कोई गार्ज ही बनाऊंगी मै तुम्हारे भीतर एक सुराख़ कर बहती रहूंगी अदृश्य जिन्दा रहूंगी तुम्हारे इतिहास में तुम्हारे भूगोलवेत्ता खोजते थक जाएंगे मेरा उदगम मेरा अवसान मै बहती रहूंगी अदृश्य तुम्हारे हृदय में सरस्वती नदी की तरह ¡ --गरिमा सिंह 

पिता होना

  कुछ भी नहीं रह सकता है अधूरा सब लालायित है पूर्णता के लिए भागती है नदी समुद्र की ओर झरना किसी नदी की तलाश मे बूंदे भी किसी गड्ढे की खोज मे गिरती है जो भी पूरा नहीं होता है जीवन मे वो मन पर लिख जाता है एक दुःस्वप्न की तरह जिसकी याद से अक्सर नींद खुल जाती है मेरा मन भी खोजता है बच्चा होना जिसका कोई पिता हो पूर्ण जिसकी अंगुलियों को पकड़ा जा सके कभी फिसलते हुए कभी तेज चलते हुए कभी पकड़ते हुए बस या कोई गाड़ी मन अनेक बार एक छाँव खोजता है वह किसी पेड़ के पास ठहर जाना चाहता है कुछ देर भले ही वह कुछ न सुनता हो कुछ न समझाता हो पिता का सानिध्य तलाशने मे मुझे मिले कई प्रेमी कई बार जीवन मे मैं नहीं बता पाई उनसे कभी मन के स्पष्ट भाव वो नहीं चुनते कभी पिता होने को उनका प्रेमी होना ही उन्हें चुनना था मेरा प्रेमी पिता की शक्ल मे ढल जाता है जीवन मे कई बार उदास शामों मे प्रेमी के गले लगकर रोते हुए वह बदल गया पिता मे उसकी अंगुलियों मे मैंने महसूस किया वात्सल्य कई बार उसके पास होकर माथे को चूमते हुए लरजते है  होंठ मेरे कुछ दिनों बाद गिर जातीहै कोई महीन चादर जो द...