कवि के मन मे रहता है एक कोना घर के सबसे पीछे अँधेरे और उपेक्षित तहखाने की तरह जहाँ वह झाँक लेता है खिड़कियों से कभी मोमबत्ती की रोशनी जलाकर अक्सर फेंक देता है अनुपयोगी सामान बीनकर कविता से और जीवन से जिसका रोशनी मे आना बना सकता है उसे कमजोर वो कई सालों से नहीं juta पाया है हिम्मत घुसने को इस सीलन भरे तहखाने मे कुछ उपयोगी वस्तुए छूट गई है बहुत पहले या फेंक दिया था, आज खोजना है उसे जैसे खो जाती है कभी कोई सूई किसी रुई के ढ़ेर मे जिसके दरवाजों की चरमराहट से उड़ जाती है मुंडेर पर बैठी चिड़िया दुबक जाते है भीतर कई चेहरे अंधेरे मे जहाँ प्रवेश करना कवि का किसी वर्जित दुनिया मे जाना है और खींच लाना है तमाम अनसुलझे रहस्य जो दर्ज है मेज पर रखी फटी डायरी मे बीच बीच मे मुडे पन्नो के साथ मन के इस कोने मे कभी करता है पुताई दीवारो की बचाने को अपनी खोई पुरानी यादों को जिसे नीम अंधेरे उठकर टटोलता है और निकलता है कुछ मरहम कोई पट्टी और दवा उसमे पड़ी है एक पुरानी डायरी के फटी पन्ने जिसमें छूट गई है अधूरी कविताएं और पुरानी पर्श मे रखा है एक पासपोर्ट फोटो जो अक्सर जीवंत हो जाती ह...
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